भिक्षुलक्षणम्—एकचर्याः, अहिंसा, कैवल्याश्रमः
Marks of the Mendicant: Solitary Wandering, Non-Injury, and the Kaivalya-Discipline
मध्यमानि द्वयान्याहुर्धर्मज्ञानीतराणि च । धर्मज्ञानि विशिष्टानि कार्याकार्योपधारणात्
मध्यम मनुष्य भी दो प्रकार के कहे गए हैं—धर्मज्ञ और धर्म से अनभिज्ञ। इनमें धर्मज्ञ ही श्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे कर्तव्य और अकर्तव्य का विवेक रखते हैं।
व्यास उवाच