Jñāna-plava (The Raft of Knowledge): Svabhāva, Prajñā, and the Ascent to Ātmajñāna
सर्वतश्न समाह॒त्य क्रतून् सर्वान् जितेन्द्रिय: । प्राप्नोति ब्रह्मण: स्थान यत्परं प्रकृतेर्धुवम्
मनुष्य को चाहिए कि वह समस्त काम्य-कर्मों का परित्याग करके इन्द्रियों को वश में कर ले। तब वह प्रकृति से परे, अविनाशी ब्रह्मपद को प्राप्त होता है।
जैगीषव्य उवाच