नोर्ध्व नावाड्न तिर्यक् च न क्वचिच्छक्र कामये । न हिज्ञेये न विज्ञाने न ज्ञाने कर्म विद्यते
हे इन्द्र! मुझे न ऊपर के लोक (स्वर्ग) की, न नीचे के लोक (पाताल) की, और न बीच के लोक (मर्त्यलोक) की भी कभी कामना होती है। ज्ञेय, विज्ञान और ज्ञान के निमित्त भी मेरे लिए कोई कर्म आवश्यक नहीं है।
प्रह्माद उवाच