वैमनस्यं च विषये यान्त्यस्य करणानि च । तस्मात् तन्मात्रमादद्याद् यावदत्र प्रयोजनम्
इससे साधक की इन्द्रियाँ विषयों के प्रति वैराग्य को प्राप्त हो जाती हैं। इसलिए उतना ही अन्न ग्रहण करना चाहिए जितना यहाँ जीवन-रक्षा के लिए आवश्यक हो।
भीष्म उवाच