Adhyāya 214: Tapas Redefined—Perpetual Discipline, Hospitality, and the Ethics of Eating (तपः-निरूपणम्, विघसाशी-अतिथिप्रिय-धर्मः)
सुदुर्गमिव पन्थानमतीत्य गुणबन्धनम् । यथा पश्येत् तथा दोषानतीत्यामृतमश्लुते
परिपक्व-बुद्धि मनुष्य अत्यन्त दुर्गम मार्ग के समान गुणों के बन्धन को पार करके, जैसे-जैसे अपने दोषों को देखता है, वैसे-वैसे उन्हें लाँघकर अमृतमय परमात्मपद को प्राप्त कर लेता है।
भीष्म उवाच