Adhyāya 199: Karma–Jñāna Causality and the Nirguṇa Brahman
Manu’s Instruction
सत्ये कुरु स्थिरं भावं मा राजन्ननृतं कृथा: । कस्मात्त्वमनृतं वाक््यं देहीति कुरुषेडशुभम्
महाराज! आप सत्य में ही अपने मन को स्थिर कीजिए; मिथ्या आचरण मत कीजिए। जब लेना ही नहीं था, तो आपने ‘दीजिए’—यह असत्य और अशुभ वचन मुख से क्यों निकाला?
ब्राह्मण उवाच