Adhyāya 189: Japa—Inquiry into the Jāpaka, Method
Vidhi), and Fruit (Phala
इत्येतै: कर्मभिरवव्यस्ता द्विजा वर्णान्तरं गता: । धर्मो यज्ञक्रिया तेषां नित्यं न प्रतिषिध्यते
इन कर्मों के कारण वे द्विज ब्राह्मणत्व से हटकर भिन्न-भिन्न वर्णों में चले गए; तथापि उनके लिए नित्यधर्म का अनुष्ठान और यज्ञकर्म कभी निषिद्ध नहीं किया गया।
भरद्वाज उवाच