Adhyāya 180: Jīva, Śarīra, and the Fire Analogy (भृगु–भरद्वाज संवादः)
स्रोतसा द्वियमाणासु प्रजासु विमना इव । धर्मकामार्थकार्येषु कूटस्थ इव लक्ष्यसे
प्रह्लाद बोले— समस्त प्रजा काम-क्रोध आदि के प्रवाह में बहती जा रही है; पर आप उससे उदासीन-से प्रतीत होते हैं। धर्म, अर्थ और काम से सम्बन्धित कार्यों के प्रति भी आप कूटस्थ-से, अचल-से दिखते हैं।
प्रह्माद उवाच