Adhyāya 180: Jīva, Śarīra, and the Fire Analogy (भृगु–भरद्वाज संवादः)
सुखमसुखमलाभमर्थलाभं रतिमरतिं मरणं च जीवितं च । विधिनियतमवेक्ष्य तत्त्वतो<5हं व्रतमिदमाजगरं शुचिश्लरामि
सुख-दुःख, लाभ-हानि, अनुकूल-प्रतिकूल तथा जीवन-मरण—ये सब विधि के अधीन हैं। इस सत्य को यथार्थतः जानकर मैं शुद्ध भाव से इस आजगर-व्रत का आचरण करता हूँ।
भीष्म उवाच