Adhyāya 180: Jīva, Śarīra, and the Fire Analogy (भृगु–भरद्वाज संवादः)
पश्य प्रह्याद संयोगान् विप्रयोगपरायणान् । संचयांश्व विनाशान्तान् न क्वचिद् विदधे मनः
प्रह्लाद! देखो—जितने संयोग हैं, उनका पर्यवसान वियोग में ही होता है; और जितने संचय हैं, उनकी समाप्ति विनाश में ही होती है। यह सब देखकर मैं कहीं भी अपने मन को नहीं लगाता।
भीष्म उवाच