Adhyaya 171
Shanti ParvaAdhyaya 17127 Verses

Adhyaya 171

निर्वेदोपदेशः (Nirveda-Upadeśa) — Maṅki’s Dispassion and the Limits of Wealth-Seeking

Upa-parva: Mokṣa-dharma (Liberation Teachings) — Nirveda and the Critique of Wealth-Seeking

Yudhiṣṭhira asks how a person dominated by thirst for wealth can attain happiness if, despite strenuous undertakings, wealth is not obtained. Bhīṣma answers by listing pacifying dispositions—equanimity, effortlessness, truthfulness, dispassion, and absence of excessive inquisitiveness—as marks of a happy person, and states that these are said by elders to conduce to praśānti. He then introduces an ancient exemplum: Maṅki repeatedly strives for wealth and, after successive failures, purchases a pair of draft calves; an unexpected incident involving a camel results in their loss, prompting Maṅki’s reflection on the uncontrollability of outcomes and the dominance of daiva (contingency/fate) over mere exertion. Maṅki addresses Kāma (desire) directly, diagnosing its origin in saṃkalpa (mental construction), and resolves to abandon acquisitive striving, practice contentment, forgiveness, non-retaliation, truth, self-restraint, and compassion. The discourse contrasts the anxiety of acquisition and the grief of loss with the superior happiness of tṛṣṇā-kṣaya (the waning of thirst). The chapter also cites Janaka’s maxim of non-attachment during Mithilā’s burning and foreshadows Bodhya’s later instruction by listing his ‘gurus’ (e.g., Piṅgalā, the kurara bird, the serpent, the deer-hunter episode, the arrow-maker, and the maiden), indicating a broader pedagogical network of renunciant insight within Mokṣa-dharma.

Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि एक पक्षी की मधुर वाणी सुनकर गौतम विस्मित हो उठता है और ‘राजधर्म’ की ओर कौतूहल से देखता है—मानो धर्म स्वयं किसी अनपेक्षित रूप में सामने आ खड़ा हुआ हो। → ‘राजधर्म’ अपना परिचय कश्यप-पुत्र के रूप में देता है और गौतम का अतिथि-सत्कार विधिपूर्वक करता है—दिव्य शालपुष्पमयी शय्या तक बनवाता है। पर शीघ्र ही गौतम अपनी दरिद्रता और धन-प्राप्ति हेतु समुद्र-गमन की आकांक्षा प्रकट करता है; प्रश्न उठता है कि क्या यह ‘राजधर्म’ सचमुच सहायता करेगा या केवल उपदेश देगा। → राजधर्म प्रसन्न होकर गौतम को आश्वस्त करता है कि उसे व्यर्थ उत्कण्ठा नहीं करनी चाहिए—वह कृतकार्य होकर धनवान बनकर घर लौटेगा; फिर मित्रता और सुहृद्भाव की घोषणा करते हुए उसके लिए वास्तविक व्यवस्था करने का संकल्प लेता है। → राजधर्म (राक्षसराज से जुड़ा प्रसंग) अपने सेवकों को आदेश देता है कि गौतम को नगरद्वार से शीघ्र ले आएँ। बुलावा पाते ही गौतम की थकान दूर हो जाती है; वह विस्मय से भरकर दौड़ता हुआ राक्षसराज के दर्शन की अभिलाषा से राजभवन की ओर बढ़ता है। → गौतम राक्षसराज के सम्मुख पहुँचने ही वाला है—अब यह स्पष्ट होना शेष है कि यह सहायता किस मूल्य पर मिलेगी और ‘कृतघ्न’ (अकृतज्ञता) की कथा किस मोड़ पर प्रकट होगी।

Shlokas

Verse 1

भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! पक्षीकी वह मधुर वाणी सुनकर गौतमको बड़ा आश्चर्य हुआ। वह कौतूहलपूर्ण दृष्टिसे राजधर्माकी ओर देखने लगा

भीष्मजी कहते हैं—राजन्! उस पक्षी की मधुर वाणी सुनकर गौतम को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह कौतूहलपूर्ण दृष्टि से राजधर्म की ओर देखने लगा।

Verse 2

राजधर्मोवाच भो: कश्यपस्य पुत्रो5हं माता दाक्षायणी च मे । अतिथि्त्वं गुणोपेत: स्वागत ते द्विजोत्तम

राजधर्म बोला—द्विजश्रेष्ठ! मैं महर्षि कश्यप का पुत्र हूँ और मेरी माता दक्षप्रजापति की कन्या दाक्षायणी हैं। आप गुणसम्पन्न अतिथि हैं; आपका स्वागत है।

Verse 3

भीष्म उवाच तस्मै दत्त्वा स सत्कारं विधिदृष्टेन कर्मणा । शालपुष्पमयीं दिव्यां बूसीं वै समकल्पयत्‌

भीष्मजी बोले—शास्त्रविहित विधि के अनुसार उसका यथोचित सत्कार करके उसने शाल के पुष्पों से बना एक दिव्य आसन तैयार कराया।

Verse 4

भगीरथरयथाक्रान्तदेशान्‌ गड़ानिषेवितान्‌ । ये चरन्ति महामीनास्तांश्व॒ तस्यान्वकल्पयत्‌

भगीरथ के रथ से रौंदे गए उन प्रदेशों में, जहाँ गंगा का प्रवाह है और जहाँ वह विचरती है, बड़े-बड़े मत्स्य चलते हैं; उन्हीं में से कुछ मछलियाँ मँगाकर उसने गौतम के लिए भोजन की व्यवस्था की।

Verse 5

वह्लिं चापि सुसंदीप्तं मीनांश्वापि सुपीवरान्‌ । स गौतमायातिथये न्यवेदयत काश्यपि:,कश्यपके उस पुत्रने अग्नि प्रजजलित कर दी और मोटे-मोटे मत्स्य लाकर अपने अतिथि गौतमको अर्पित कर दिये

उस कश्यपपुत्र ने अग्नि को भली-भाँति प्रज्वलित किया और मोटे-ताज़े मत्स्य लाकर अतिथि गौतम को अर्पित कर दिए।

Verse 6

भुक्तवन्तं च त॑ विप्रं प्रीतात्मानं महातपा: । क्लमापनयनार्थ स पक्षाभ्यामभ्यवीजयत्‌

जब वह ब्राह्मण भोजन कर चुका और उसका मन तृप्त हो गया, तब वह महातपस्वी पक्षी उसकी थकावट दूर करने के लिए अपने पंखों से उसे हवा करने लगा।

Verse 7

ततो विश्रान्तमासीन गोत्रप्रश्नमपृच्छत । सोडब्रवीद्‌ गौतमो<स्मीति ब्रह्म नान्यदुदाहरत्‌

फिर विश्राम करके बैठने पर उससे गोत्र पूछा गया। उसने कहा—“मैं गौतम हूँ”; और बस इतना ही बताया कि वह ब्राह्मण है, इसके अतिरिक्त कुछ न बोला।

Verse 8

तस्मै पर्णमयं दिव्यं दिव्यपुष्पाधिवासितम्‌ । गन्धाढ्यं शयनं प्रादात्‌ स शिश्ये तत्र वै सुखम्‌

तब पक्षी ने उसके लिये पत्तों का दिव्य बिछावन तैयार किया, जो दिव्य पुष्पों से आच्छादित होने के कारण सुगन्ध से महक रहा था। उसने वह शयन गौतम को दे दिया और गौतम उस पर सुखपूर्वक सो गया।

Verse 9

अथोपविष्टं शयने गौतमं धर्मराट्‌ तदा । पप्रच्छ काश्यपो वाग्मी किमागमनकारणम्‌,धर्मराज! जब गौतम उस बिछौनेपर बैठा तब बात-चीतमें कुशल कश्यपकुमारने पूछा --“ब्रह्मम! आप इधर किसलिये आये हैं?

धर्मराज! जब गौतम उस बिछौने पर बैठ गया, तब वाणी में कुशल कश्यप ने उससे पूछा—“ब्रह्मन्! आप यहाँ किस कारण से आये हैं?”

Verse 10

ततोडब्रवीद्‌ गौतमस्तं दरिद्रो5हं महामते । समुद्रगमनाकांक्षी द्रव्यार्थमिति भारत,भारत! तब गौतमने उससे कहा--“महामते! मैं दरिद्र हूँ और धनके लिये समुद्रतटपर जानेकी इच्छा लेकर घरसे चला हूँ”

भारत! तब गौतम ने उससे कहा—“महामते! मैं दरिद्र हूँ; धन के लिये समुद्र-तट पर जाने की इच्छा लेकर मैं घर से चला हूँ।”

Verse 11

त॑ काश्यपो<ब्रवीत्‌ प्रीतो नोत्कण्ठां कर्तुमहसि । कृतकार्यो द्विजश्रेष्ठ सद्रव्यो यास्यसे गृहान्‌

यह सुनकर कश्यप प्रसन्न होकर बोला—“द्विजश्रेष्ठ! वहाँ तक जाने के लिये अब उत्सुक न हों। आपका कार्य यहीं सिद्ध हो जायेगा। यहीं से धन लेकर आप कृतकार्य होकर अपने घर लौट जायेंगे।”

Verse 12

चतुर्विधा हार्थसिद्धिर्ब्‌हस्पतिमतं यथा । पारम्पर्य तथा दैवं काम्य॑ मैत्रमिति प्रभो

प्रभो! बृहस्पति के मत के अनुसार अर्थ-सिद्धि चार प्रकार की होती है—वंश-परम्परा से, दैव (भाग्य) की अनुकूलता से, धन के लिये किये गये सकाम प्रयत्न से, और मित्र के सहयोग से।

Verse 13

प्रादुर्भूतो5स्मि ते मित्र सुहृत्त्वंच मम त्वयि । सो<हं तथा यतिष्यामि भविष्यसि यथार्थवान्‌

भीष्म बोले— मित्र! मैं तुम्हारे लिए प्रकट हुआ हूँ और तुम्हारे प्रति मेरा सौहार्द बढ़ गया है। इसलिए मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा कि तुम सचमुच अर्थ (अभिलषित प्रयोजन) को प्राप्त करने वाले बन जाओ।

Verse 14

ततः प्रभातसमये सुखं दृष्टवाब्रवीदिदम्‌ । गच्छ सौम्य पथानेन कृतकृत्यो भविष्यसि

तब प्रभातकाल में उसे सुखपूर्वक देखकर (भीष्म ने) कहा— “सौम्य! इसी मार्ग से जाओ; तुम कृतकृत्य होकर लौटोगे।”

Verse 15

इतस्त्रियोजनं गत्वा राक्षसाधिपतिर्महान्‌ | विरूपाक्ष इति ख्यात: सखा मम महाबल:

भीष्म बोले— “यहाँ से तीन योजन आगे जाने पर राक्षसों का एक महान् अधिपति है, जो ‘विरूपाक्ष’ नाम से प्रसिद्ध है—वह मेरा महाबली मित्र है।”

Verse 16

तदनन्तर! जब प्रातःकाल हुआ तब राजधर्मने ब्राह्मणके सुखका उपाय सोचकर इस प्रकार कहा--'सौम्य! इस मार्गसे जाइये, आपका कार्य सिद्ध हो जायगा। यहाँसे तीन योजन दूर जानेपर जो नगर मिलेगा, वहाँ महाबली राक्षसराज विरूपाक्ष रहते हैं, वे मेरे महान्‌ मित्र हैं ।।

तदनंतर प्रातःकाल होने पर राजा धर्म ने ब्राह्मण के कल्याण का उपाय सोचकर कहा— “सौम्य! इसी मार्ग से जाइए; आपका कार्य सिद्ध होगा। यहाँ से तीन योजन दूर जो नगर है, वहाँ महाबली राक्षसराज विरूपाक्ष रहते हैं; वे मेरे महान मित्र हैं। हे द्विजश्रेष्ठ! आप उनके पास जाइए; मेरे वचन से प्रेरित होकर वे आपको इच्छित धन देंगे और आपकी मनोवांछित कामनाएँ पूर्ण करेंगे—इसमें संशय नहीं।”

Verse 17

इत्युक्त: प्रययौ राजन्‌ गौतमो विगतक्लम: । फलान्यमृतकल्पानि भक्षयन्‌ स यथेष्टत:

भीष्म बोले— “राजन्! ऐसा कहे जाने पर गौतम वहाँ से चल पड़ा; उसकी सारी थकावट दूर हो गई थी। मार्ग में वह तेजपातों की सुगंधित वाटिकाओं में, जहाँ चन्दन और अगुरु के वृक्ष बहुत थे, विश्राम करता और इच्छानुसार अमृत-तुल्य मधुर फल खाता हुआ शीघ्र आगे बढ़ता गया।”

Verse 18

चन्दनागुरुमुख्यानि त्वक्पत्राणां वनानि च । तस्मिन्‌ पथि महाराज सेवमानो द्रुतं ययौ

भीष्म बोले—महाराज, उस मार्ग में तेजपात के वन थे, जहाँ चन्दन और अगुरु के वृक्ष प्रधान थे। वह चलते-चलते वहाँ विश्राम करता, इच्छानुसार अमृत-तुल्य मधुर फल खाता हुआ, बड़ी तेजी से आगे बढ़ता चला गया।

Verse 19

ततो मेरुव्रजं नाम नगरं शैलतोरणम्‌ | शैलप्राकारवप्रं च शैलयन्त्राकुलं तथा

फिर वह चलते-चलते मेरुव्रज नामक नगर में जा पहुँचा, जिसका तोरण-द्वार पर्वत-शिला के समान था। वह नगर शैल-प्राकार और ऊँचे वप्रों से घिरा था तथा चारों ओर शिला-निर्मित यन्त्रों से सुसज्जित था।

Verse 20

विदितश्नाभवत्‌ तस्य राक्षसेन्द्रस्य धीमत: । प्रहित: सुह्ददा राजन्‌ प्रीयमाण: प्रियातिथि:

तब उस परम बुद्धिमान राक्षसेन्द्र को यह ज्ञात हुआ कि, राजन्, एक सुहृद् मित्र द्वारा भेजा गया प्रिय अतिथि प्रसन्नचित्त होकर आया है।

Verse 21

ततः स राक्षसेन्द्र: स्वान्‌ प्रेष्पयानाह युधिष्ठिर गौतमो नगरद्वारात्‌ शीघ्रमानीयतामिति,युधिष्ठिर! यह समाचार पाते ही राक्षसराजने अपने सेवकोंसे कहा--“गौतमको नगरद्वारसे शीघ्र यहाँ लाया जाय”

तब राक्षसराज ने अपने सेवकों से कहा—“युधिष्ठिर! गौतम को नगरद्वार से शीघ्र यहाँ लाया जाए।”

Verse 22

ततः पुरवरात्‌ तस्मात्‌ पुरुषा: श्येनचेष्टना: । गौतमेत्यभिभाषन्त: पुरद्वारमुपागमन्‌,यह आदेश प्राप्त होते ही राजसेवक गौतमको पुकारते हुए बाजकी तरह झपटकर उस श्रेष्ठ नगरके फाटकपर आये

तब उस श्रेष्ठ नगर से बाज की-सी फुर्ती वाले पुरुष, गौतम को पुकारते हुए, नगरद्वार पर जा पहुँचे।

Verse 23

ते तमूचुर्महाराज राजप्रेष्यास्तदा द्विजम्‌ । त्वरस्व तूर्णमागच्छ राजा त्वां द्रष्टमिच्छति

तब, महाराज, राजदूतों ने उस ब्राह्मण से कहा—“ब्राह्मण! शीघ्र कीजिए, तुरंत आइए; महाराज आपको देखना चाहते हैं।”

Verse 24

राक्षसाधिपतिर्वीरो विरूपाक्ष इति श्रुत: । सत्यवां त्वरति वै द्रष्ट तत्‌ क्षिप्रं संविधीयताम्‌,“विरूपाक्ष नामसे प्रसिद्ध वीर राक्षलराज आपको देखनेके लिये उतावले हो रहे हैं; अतः आप शीघ्रता कीजिये”

भीष्म ने कहा—“राक्षसों का वीर अधिपति, जो ‘विरूपाक्ष’ नाम से प्रसिद्ध है, सत्यवान को देखने के लिए अत्यंत उतावला है; अतः शीघ्र ही सब प्रबंध कर दिए जाएँ।”

Verse 25

ततः स प्राद्रवद्‌ विप्रो विस्‍स्मयाद्‌ विगतक्लम: । गौतम: परमर्धि तां पश्चन्‌ परमविस्मित:

तब गौतम ब्राह्मण, विस्मय के कारण जिसकी थकावट जाती रही थी, दौड़ पड़ा। उस परम समृद्धि को देखकर वह और भी अधिक चकित हो उठा।

Verse 26

तैरेव सहितो राज्ञो वेश्म तूर्णमुपाद्रवत्‌ । दर्शन राक्षसेन्द्रस्य कांक्षमाणो द्विजस्तदा,राक्षसराजके दर्शनकी इच्छा मनमें लिये वह ब्राह्मण उन सेवकोंके साथ शीघ्र ही राजमहलमें जा पहुँचा

तब वह ब्राह्मण उन्हीं सेवकों के साथ शीघ्र ही राजा के महल की ओर दौड़ा, क्योंकि वह उस समय राक्षसेन्द्र के दर्शन की आकांक्षा रखता था।

Verse 170

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कृतघ्नोपाख्याने सप्तत्यधिकशततमो<ध्याय:

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के आपद्धर्मपर्व में ‘कृतघ्नोपाख्यान’ के अंतर्गत एक सौ सत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

The problem is the instability of happiness when one’s identity is organized around wealth-acquisition: if effort does not yield wealth, and craving persists, what conduct can still produce sukha (well-being)?

Maṅki identifies desire as arising from saṃkalpa (conceptual/volitional construction) and proposes a practical remedy: refuse to elaborate saṃkalpa, cultivate contentment and restraint, and thereby weaken the root of craving and its downstream grief.

It does not present a formal phalaśruti formula; instead, it embeds an implied result: adopting nirveda and abandoning compulsive acquisition leads to śānti and a superior happiness characterized as tṛṣṇā-kṣaya, framed as a soteriological gain within Mokṣa-dharma.