Janamejaya’s Appeal for Pacification and Śaunaka’s Counsel on Humility (जनमेजय-शौनक संवादः)
अग्निमशध्ये प्रविष्ट॑ तु लुब्धो दृष्टवा तु पक्षिणम् । चिन्तयामास मनसा किमिदं वै मया कृतम्,पक्षीको आगके भीतर घुसा हुआ देख व्याध मन-ही-मन चिन्ता करने लगा कि मैंने यह क्या कर डाला?
agnimadhye praviṣṭaṃ tu lubdho dṛṣṭvā tu pakṣiṇam | cintayāmāsa manasā kim idaṃ vai mayā kṛtam ||
पक्षी को अग्नि के बीच प्रवेश करता देखकर वह लोभी व्याध मन-ही-मन सोचने लगा—“यह मैंने क्या कर डाला?”
भीष्म उवाच