Śaraṇāgata-Atithi-Dharma in the Kapota Narrative (कपोत-आख्यानम्—शरणागतधर्मः)
स संहृत्य च तत् कर्म अनास्वाद्य च तद्धवि: । तोषयामास देवांश्व पितृश्च द्विजसत्तम:
उस द्विजश्रेष्ठ मुनि ने वह कर्म समेटकर, उस हविष्य का आस्वादन किए बिना ही देवताओं और पितरों को तृप्त कर दिया।
भीष्म उवाच