Śaraṇāgata-Atithi-Dharma in the Kapota Narrative (कपोत-आख्यानम्—शरणागतधर्मः)
सो5हमन्त्यावसायानां हराम्येनां प्रतिग्रहात् । न स्तैन्यदोषं पश्यामि हरिष्यामि श्वजाघनीम्
अतः मैं इन अन्त्यजों (चाण्डालों) के घर से यह कुत्ते की जाँघ चुरा लेता हूँ। दान लेकर जीने से अधिक दोष मुझे इस चोरी में नहीं दिखता; इसलिए मैं इसे अवश्य ले जाऊँगा।
भीष्म उवाच