Śaraṇāgatapālana—Prastāvanā
Protection of the Refuge-Seeker: Opening of the Kapota Narrative
अज्जलिं शपथं सान्त्व॑ प्रणम्य शिरसा वदेत् । अश्रुप्रमार्जनं चैव कर्तव्यं भूतिमिच्छता
ऐश्वर्य चाहने वाले राजा को चाहिए कि अवसर देखकर शत्रु के सामने हाथ जोड़कर शपथ खाए, आश्वासन दे, और सिर झुकाकर विनय से बात करे। इतना ही नहीं, यदि आवश्यकता हो तो उसे धैर्य बँधाकर उसके आँसू तक पोंछ दे।
भीष्म उवाच