Dasyu-maryādā and Buddhi-guided Rāja-nīti (दस्युमर्यादा तथा बुद्धिप्रधान-राजनीति)
वधबन्धकृतं दुःखं स्वीकृतं सहजं तथा । दुःखं सुतेन सततं जनान् विपरिवर्तते
वध और बन्धन से भी सबको दुःख होता है। स्त्री के कारण और स्वाभाविक रूप से भी दुःख होता है; तथा पुत्र नष्ट हो जाए या दुष्ट निकल जाए, तो उससे भी लोगों को सदा दुःख प्राप्त होता रहता है।
ब्रह्मदत्त उवाच