Dasyu-maryādā and Buddhi-guided Rāja-nīti (दस्युमर्यादा तथा बुद्धिप्रधान-राजनीति)
पूजन्युवाच सकृत् कृतापराधस्य तत्रैव परिलम्बतः । न तद् बुधाः प्रशंसन्ति श्रेयस्तत्रापसर्पणम्
पूजनी बोली—राजन्! जो एक बार अपराध कर चुका हो, उसका वहीं ठहर जाना विद्वान पुरुष प्रशंसा नहीं करते; वहाँ से हट जाना ही उसके लिए कल्याणकर है।
ब्रह्मदत्त उवाच