दीर्घदर्शी–दीर्घसूत्र–संप्रतिपत्तिमान् आख्यानम्
The Parable of Foresight, Procrastination, and Presence of Mind
वशे बलवतां धर्म: सुखं भोगवतामिव । नास्त्यसाध्यं बलवतां सर्व बलवतां शुचि
जैसे भोग-सामग्री से सम्पन्न पुरुषों के अधीन सुख-भोग रहता है, वैसे ही धर्म बलवानों के वश में रहता है। बलवानों के लिए कुछ भी असाध्य नहीं; बलवानों की सब वस्तुएँ शुद्ध और निर्दोष मानी जाती हैं।
भीष्म उवाच