Adhyaya 130
Shanti ParvaAdhyaya 13013 Verses

Adhyaya 130

Āpad-dharma and Discernment in Livelihood (आपद्धर्मे विज्ञानबलम्)

Upa-parva: Āpad-dharma / Ethical Conduct in Calamity (within Śānti-parva rājadharma discourse)

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma how a brāhmaṇa should sustain life when the age is degraded and social livelihood becomes predatory, especially when compassion for dependents prevents renunciation. Bhīṣma answers that one should rely on the ‘strength of discernment’ (vijñāna-bala) and treat all action as justified only insofar as it serves a ‘good end’ (sādhu-artha). He permits, under crisis logic, taking resources from the unethical to support the ethical, framing such transfer as a dharma-informed reallocation rather than ordinary theft. The chapter then marks limits: do not harass or punish respected ritual specialists (ṛtvik, purohita, ācārya); treat enduring norms as the “eye of the world” (pramāṇa) for distinguishing right and wrong; and do not let angry local talk determine royal action. A sustained warning follows against parivāda/paiśunya (defamation, malicious speech): it should neither be spoken nor listened to, and the virtuous are characterized as speakers of merits rather than faults. The chapter concludes by elevating ācāra (good conduct) as a major sign of dharma, noting competing claims of textualism, and affirming ṛṣi exemplars as strong evidence while cautioning that deceitful gain diminishes dharma. Finally, dharma is described as difficult to track—like following a wounded animal’s trail—requiring disciplined, trained pathways associated with rājarṣi conduct.

Chapter Arc: युधिष्ठिर धर्मामृत से तृप्त न होकर भीष्म से पुनः धर्म की ही कथा माँगते हैं—और भीष्म एक प्राचीन इतिहास का द्वार खोलते हैं: यम और महात्मा गौतम का संवाद। → पारियात्र पर्वत के महान आश्रम में गौतम की दीर्घ तपस्या (साठ हजार वर्ष) का वर्णन होता है। तप से भावित ऋषि के सामने यम प्रकट होते हैं, और गौतम मनुष्य-जीवन की सबसे कठिन गाँठें पूछते हैं—माता-पिता के ऋण से मुक्ति कैसे, और दुर्लभ शुद्ध लोक कैसे प्राप्त हों? → यम का निर्णायक उपदेश: तप, शौच (बाह्य-आन्तरिक पवित्रता), सत्य और धर्म में निरत रहकर माता-पिता की प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक पूजा/सेवा—यही अनृणता (ऋण-मुक्ति) का मूल मार्ग है; और राजधर्म के स्तर पर, पर्याप्त दक्षिणाओं सहित अनेक अश्वमेध यज्ञों द्वारा अद्भुत लोकों की प्राप्ति का विधान। → संवाद का निष्कर्ष यह स्थापित करता है कि व्यक्तिगत धर्म (सेवा, सत्य, शौच, तप) और राजधर्म (यज्ञ, दान, विधिपूर्वक कर्म) दोनों अपने-अपने अधिकार-क्षेत्र में लोक-कल्याण और परलोक-गति के साधन हैं; युधिष्ठिर के लिए यह शिक्षा राज्य-कर्तव्य और आत्म-शुद्धि के संतुलन का संकेत बनती है।

Shlokas

Verse 1

ऑपनआक्रा बछ। जज स::ः: - आशाको अत्यन्त कृश कहनेका तात्पर्य यह है कि वह मनुष्यको अत्यन्त कृश बना देती है। एकोनत्रिशर्दाधिकशततमो< ध्याय: यम और गौतमका संवाद युधिछिर उवाच नामृतस्येव पर्याप्तिर्ममास्ति ब्रुवति त्वयि । यथा हि स्वात्मवृत्तिस्थस्तथा तृप्तोडस्मि भारत

युधिष्ठिर ने कहा—भरतनन्दन! जैसे अमृत पीने से भी तृप्ति नहीं होती, उलटे और पीने की इच्छा बढ़ती जाती है, वैसे ही जब आप बोलते हैं तो सुनकर मेरा मन नहीं भरता। और जैसे परमात्मा के ध्यान में निमग्न योगी परमानन्द से तृप्त हो जाता है, वैसे ही आपके उपदेश सुनकर मैं भी गहन तृप्ति का अनुभव करता हूँ।

Verse 2

तस्मात्‌ कथय भूयस्त्वं धर्ममेव पितामह । न हि तृप्तिमहं यामि पिबन्‌ धर्मामृतं हि ते

अतः पितामह! आप फिर से धर्म की ही बात कहिए। आपके धर्मोपदेशरूपी अमृत का पान करते हुए मुझे कभी यह नहीं लगता कि अब पूरा हो गया; बल्कि सुनने की प्यास और बढ़ती ही जाती है।

Verse 3

भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । गौतमस्य च संवादं यमस्य च महात्मन:

भीष्म ने कहा—युधिष्ठिर! इस धर्म-विषय में भी विद्वान लोग एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण देते हैं—महर्षि गौतम और महात्मा यम के संवाद का।

Verse 4

पारियात्र गिरिं प्राप्प गौतमस्याश्रमो महान्‌ | उवास गौतमो यं च काल॑ तमपि मे शूणु,पारियात्रनामक पर्वतपर महर्षि गौतमका महान्‌ आश्रम है। उसमें गौतम जितने समयतक रहे, वह भी मुझसे सुनो

भीष्म ने कहा—पारियात्र पर्वत पर महर्षि गौतम का महान आश्रम था। गौतम वहाँ जितने समय तक रहे, वह भी मुझसे सुनो।

Verse 5

षष्टिं वर्षसहस्राणि सो5तप्यद्‌ गौतमस्तप: । तमुग्रतपसा युक्त भावितं सुमहामुनिम्‌

भीष्म बोले—गौतम ने उस आश्रम में साठ हजार वर्षों तक तप किया। उग्र तपस्या से परिपक्व और पवित्र हुए उस महर्षि, महामुनि के पास धर्मपाल यम स्वयं उन्हें देखने के लिए आए।

Verse 6

उपयातो नरव्यात्र लोकपालो यमस्तदा | तमपश्यत्‌ सुतपसमृषिं वै गौतमं तदा

नरश्रेष्ठ! तब लोकपाल यम वहाँ आए और उन्होंने उस समय उत्तम तपस्वी ऋषि गौतम को देखा।

Verse 7

सतं विदित्वा ब्रद्मर्षियममागतमोजसा । प्राउजलि: प्रयतो भूत्वा उपविष्टस्तपोधन:,ब्रह्मर्षि गौतमने वहाँ आये हुए यमराजको उनके तेजसे ही जान लिया। फिर वे तपोधन मुनि हाथ जोड़ संयतचित्त हो उनके पास जा बैठे

तपोधन ब्रह्मर्षि गौतम ने उनके तेज से ही जान लिया कि यह यमराज हैं। तब वे संयतचित्त होकर हाथ जोड़कर उनके निकट जाकर बैठ गए।

Verse 8

त॑ं धर्मराजो दृष्ट्वैव सत्कृत्यैव द्विजर्षभम्‌ | न्यमन्त्रयत धर्मेण क्रियतां किमिति ब्रुवन्‌

धर्मराज ने उस द्विजश्रेष्ठ को देखते ही विधिपूर्वक सत्कार किया और धर्मानुसार आमंत्रित करके बोले—“बताइए, आपके लिए क्या किया जाए? मैं कौन-सी सेवा करूँ?”

Verse 9

गौतम उवाच मातापितृभ्यामानृण्यं कि कृत्वा समवाप्रुयात्‌ । कथं च लोकानाप्रोति पुरुषो दुर्लभान्‌ शुचीन्‌

गौतम बोले—“भगवन्! मनुष्य कौन-सा कर्म करके माता-पिता के ऋण से उऋण होता है? और किस प्रकार वह दुर्लभ तथा पवित्र लोकों को प्राप्त करता है?”

Verse 10

यम उवाच तपःशौचवता नित्यं सत्यधर्मरतेन च | मातापित्रोरहरह: पूजनं कार्यमज्जसा

यमराज ने कहा—ब्राह्मण! मनुष्य को नित्य तप करना चाहिए, बाहर-भीतर से पवित्र रहना चाहिए और सत्य-धर्म में सदा रत रहना चाहिए। यह सब करते हुए उसे बिना विलम्ब प्रतिदिन माता-पिता की सेवा-पूजा करनी चाहिए।

Verse 11

अश्वमेधैश्व यष्टव्यं बहुभि: स्वाप्तदक्षिणै: । तेन लोकानवाप्रोति पुरुषो5द्धभुतदर्शनान्‌

राजा को पर्याप्त दक्षिणाओं से युक्त अनेक अश्वमेध यज्ञों का भी अनुष्ठान करना चाहिए। ऐसा करने से पुरुष अद्भुत दृश्यों से सम्पन्न पुण्यलोकों को प्राप्त कर लेता है।

Verse 128

इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधमनुिशासनपर्वमें ऋषभगीताविषयक एक सौ अद्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्व में ऋषभगीता-विषयक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 129

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि यमगौतमसंवादे एकोनत्रिंशदधिकशततमो< ध्याय:

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्व में यम और गौतम के संवाद-विषयक एक सौ उनतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

How a brāhmaṇa should ethically maintain livelihood in a degraded social order without abandoning dependents, and what actions remain permissible when ordinary norms cannot be sustained.

Discernment (vijñāna) must govern crisis action: survival choices are evaluated by whether they serve a genuinely ethical end, avoid institutional harm, and preserve social trust by refusing slander and destabilizing speech.

Yes: dharma is portrayed as difficult to trace and requiring trained judgment, with ācāra (exemplary conduct) and ṛṣi precedents treated as strong indicators, while deceitful acquisition is flagged as dharma-diminishing even if materially successful.