Nakula’s Counsel on Yajña, Dāna, and Tyāga (नकुलोपदेशः—यज्ञदानत्यागविचारः)
अश्वान् गाश्नैव दासीश्व करेणूश्न॒ स्वलंकृता: । ग्रामाउ्जनपदांश्वैव क्षेत्राणि च गृहाणि च
हे प्रजानाथ! यदि हम ईर्ष्या से ग्रस्त होकर ब्राह्मणों को घोड़े, गायें, दासियाँ, सुसज्जित हथिनियाँ, गाँव, जनपद, खेत और घर आदि का दान न करें, तो हम राजाओं में ‘कलि’ समझे जाएँगे।
नकुल उवाच