उत्साहश्व कृतो नित्यं मया दिष्ट्या युयुत्सता । दिष्ट्या चास्मिन् हतो युद्धे निहतज्ञातिबान्धव:,'सौभाग्यवश मैंने रणभूमिमें जूझनेकी इच्छा रखकर सदा ही उत्साह दिखाया है और भाई-बन्धुओंके मारे जानेपर स्वयं भी युद्धमें ही प्राण-त्याग कर रहा हूँ, इससे मुझे विशेष संतोष है
सौभाग्यवश, रण में जूझने की इच्छा रखकर मैंने सदा उत्साह धारण किया। और यह भी सौभाग्य है कि अपने ज्ञाति-बान्धवों के मारे जाने पर मैं स्वयं भी इसी युद्ध में प्राण त्याग रहा हूँ।
संजय उवाच