Vṛddha-kanyā-carita and Balarāma’s Kurukṣetra Inquiry (वृद्धकन्या-चरितम् / कुरुक्षेत्रफल-प्रश्नः)
हीयेतां तावुभीौ क्षिप्रं स्थातां वा वैरिणावुभौ । तब वहाँ उन मुनियोंने कहा--'बेटा! तुम तो अभी बालक हो” (हम तुम्हारे शिष्य कैसे हो सकते हैं?) तब सारस्वतने पुनः उन मुनियोंसे कहा--“मेरा धर्म नष्ट न हो, इसलिये मैं आपलोगोंको शिष्य बनाना चाहता हूँ; क्योंकि जो अधर्मपूर्वक वेदोंका प्रवचन करता है तथा जो अधर्मपूर्वक उन वेदमन्त्रोंको ग्रहण करता है, वे दोनों शीघ्र ही हीनावस्थाको प्राप्त होते हैं अथवा दोनों एक-दूसरेके वैरी हो जाते हैं || ४७-४८ $ ।। न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभि:
hīyetāṃ tāv ubhau kṣipraṃ sthātāṃ vā vairiṇāv ubhau |
वैशम्पायन बोले—यदि कोई अधर्मपूर्वक वेदों का प्रवचन करे और दूसरा अधर्मपूर्वक उन मन्त्रों को ग्रहण करे, तो वे दोनों शीघ्र ही हीनावस्था को प्राप्त होते हैं—अथवा परस्पर वैरी हो जाते हैं।
वैशम्पायन उवाच