Adhyāya 33: Rauhiṇeya (Balarāma) is welcomed and takes his seat to witness the gadā-engagement
अत्यन्तवनवासाय सृष्टा भैक्ष्याय वा पुन: । 'फिर भी आपने बारंबार कहा है कि “तुम हमलोगोंमेंसे एकको भी मारकर राजा हो जाओ।/ निश्चय ही राजा पाण्डु और कुन्तीदेवीकी संतान राज्य भोगनेकी अधिकारिणी नहीं है। विधाताने इसे अनन्त कालतक वनवास करने अथवा भीख माँगनेके लिये ही पैदा किया है!
atyantavanavāsāya sṛṣṭā bhaikṣyāya vā punaḥ |
संजय बोले—आपने बार-बार यह कठोर वचन कहा है कि “ये तो अनन्त वनवास के लिए—या फिर भीख माँगकर जीने के लिए—ही रचे गए हैं। तुम इन में से किसी एक को मारकर राजा बन जाओ। पाण्डु और कुन्ती की संतानें राज्य भोगने की अधिकारिणी नहीं; विधाता ने इन्हें सदा के लिए वनवास या भिक्षा के लिए ही उत्पन्न किया है।”
संजय उवाच