गदायुद्धप्रतिज्ञा — The Vow and Terms of the Mace Duel
तथाप्येन॑ ह्वतं युद्धे लोका द्रक्ष्यन्ति माधव । “माधव! यद्यपि यह छल-कपटकी विद्यामें बड़ा चतुर है, तथापि कपट करके मेरे हाथसे जीवित नहीं छूट सकता। यदि समरांगणमें साक्षात् वज्रधारी इन्द्र इसकी सहायता करें तो भी युद्धमें इसे सब लोग मरा हुआ ही देखेंगे”,गच्छ त्वं भुड्क्ष्व राजेन्द्र पृथिवीं निहतेश्वराम् । हतयोधां नष्टरत्नां क्षीणवृत्ति्यथासुखम् राजेन्द्र! जाओ, जिसके स्वामीका नाश हो गया है, योद्धा मारे गये हैं और सारे रत्न नष्ट हो गये हैं, उस पृथ्वीका आनन्दपूर्वक उपभोग करो; क्योंकि तुम्हारी जीविका क्षीण हो गयी थी
tathāpy enaṁ hṛtaṁ yuddhe lokā drakṣyanti mādhava | “mādhava! yadyapi ayaṁ chala-kapaṭa-vidyāyāṁ baḍā caturaḥ, tathāpi kapaṭaṁ kṛtvā mama hastād jīvitaṁ na mucyate | yadi samarāṅgaṇe sākṣād vajradhārī indraḥ asya sahāyaḥ syāt, tathāpi yuddhe enaṁ sarve lokā mṛtam eva drakṣyanti” | gaccha tvaṁ bhuṅkṣva rājendra pṛthivīṁ nihatēśvarām | hata-yodhāṁ naṣṭa-ratnāṁ kṣīṇa-vṛttyā yathā-sukham ||
माधव! फिर भी लोग उसे युद्ध में मरा हुआ ही देखेंगे। ‘माधव! यह छल-कपट की विद्या में चाहे जितना चतुर हो, पर कपट से मेरे हाथ से जीवित नहीं छूट सकेगा। यदि समरभूमि में साक्षात् वज्रधारी इन्द्र भी इसकी सहायता करें, तब भी सब लोग इसे युद्ध में मरा हुआ ही देखेंगे।’ राजेन्द्र! तुम जाओ और उस पृथ्वी का उपभोग करो जिसके स्वामी का नाश हो गया है, जिसके योद्धा मारे गये हैं और जिसके रत्न नष्ट हो गये हैं; अपनी क्षीण हुई जीविका के अनुसार, जैसे बन पड़े, वैसे सुख से रहो।
संजय उवाच