Dvaipāyana-hrade Duryodhanasya Māyā — Yudhiṣṭhirasya Dharmoktiḥ (Śalya-parva, Adhyāya 30)
इत्येवं चिन्तयानास्तु रथेभ्यो5श्वान् विमुच्यते । तत्रासांचक्रिरे राजन् कृपप्रभूतयो रथा:,राजन! उधर कृपाचार्य आदि महारथी रथोंसे घोड़ोंकोी खोलकर यह सोचने लगे कि “अब युद्ध किस तरह होगा? राजा दुर्योधनकी क्या दशा होगी और पाण्डव किस प्रकार कुरुराज दुर्योधनका पता पायेंगे” ऐसी चिन्ता करते हुए वे वहाँ बैठकर आराम करने लगे
ity evaṁ cintayānās tu rathebhyo 'śvān vimucyate | tatrāsāṁ cakrire rājan kṛpa-prabhūtayo rathāḥ ||
राजन्! इसी प्रकार चिन्ता में डूबे हुए उन्होंने रथों से घोड़े खोल दिए। वहाँ कृपाचार्य आदि महारथियों ने पड़ाव डालकर विश्राम किया।
संजय उवाच