अध्याय ३: कृपस्य दुर्योधनं प्रति नीत्युपदेशः
Kṛpa’s Counsel to Duryodhana
पुनरेवाभ्यवर्तन्त क्षत्रिया: पाण्डवान् प्रति । पराजयममृष्यन्तः कृतचित्ताश्न विक्रमे,राजा दुर्योधनकी उस बातका आदर करके वे महारथी क्षत्रिय पुनः युद्ध करनेके लिये पाण्डवोंके सामने आये। उन्हें पराजय असह्यु हो उठी थी; इसलिये उन्होंने पराक्रम करनेमें ही मन लगाया था
वे क्षत्रिय फिर पाण्डवों की ओर लौटे। पराजय सह न सकने के कारण उन्होंने अपना चित्त अपने ही पराक्रम में दृढ़ कर लिया।
संजय उवाच