धृतराष्ट्र-संजय-संवादः — दुर्योधनस्य ह्रदप्रवेशः
Dhṛtarāṣṭra–Saṃjaya Dialogue: Duryodhana’s Entry into the Lake
प्रजानाथ! बाणोंसे ढके हुए भागते घोड़ोंने, जो बहुत-से मरे हुए वीरोंको अपने साथ इधर-उधर खींचे लिये जाते थे, यत्र-तत्र जानेका मार्ग अवरुद्ध कर दिया ।। निहतानां हयानां च सहैव हयसादिभि: । वर्मभिविनिकृत्तैश्न प्रासैश्छिन्नेश्न मारिष,मान्यवर नरेश! घुड़सवारोंसहित मारे गये घोड़ोंके शरीरों, कटे हुए कवचों, टूक-टूक हुए प्रासों, ऋष्टियों, शक्तियों, खड़गों, भालों और फरसोंसे ढकी हुई पृथ्वी बहुरंगी फलोंसे आच्छादित हो चितकबरी हुई-सी जान पड़ती थी
sañjaya uvāca | prajānātha! bāṇaiḥ saṃchannā dhāvantaḥ hayā bahūn nihatān vīrān sahaiva itastataḥ kṛṣyamāṇāḥ yatratatra gati-mārgaṃ ruddhvā tiṣṭhanti sma || nihatānāṃ hayānāṃ ca sahaiva hayasādibhiḥ | varma-bhir vinikṛttaiś ca prāsaiś chinnaiś ca māriṣa, mānyavara nareśa! ṛṣṭi-śakti-khaḍga-bhāla-paraśubhiś ca pṛthivī bahuvarṇaiḥ phalaiḥ iva ācchāditā citrāṅgīva pratibhāti sma ||
प्रजानाथ! बाणों से ढके हुए, भय से भागते घोड़े बहुत-से मरे हुए वीरों को साथ घसीटते हुए इधर-उधर दौड़े; इससे जहाँ-तहाँ जाने के मार्ग अवरुद्ध हो गए। और, मान्यवर! घुड़सवारों सहित मारे गए घोड़ों के शरीरों, कटे हुए कवचों, तथा टूटे-फूटे प्रासों के साथ-साथ ऋष्टियों, शक्तियों, खड्गों, भालों और फरसों से पृथ्वी ढँक गई; वह मानो अनेक रंगों के फलों से आच्छादित होकर चितकबरी-सी प्रतीत होती थी।
संजय उवाच