Chapter 23: Śakuni Reports, Kaurava Advance, and Arjuna’s Penetration of the Host
भरतश्रेष्ठ! शूरवीरोंकी भुजाओंसे छूटी हुई शक्तियाँ शत्रुओंपर इस प्रकार गिरती थीं, मानो आकाशशसे तारे टूटकर पड़ रहे हों। कौरव-पाण्डवयोद्धाओंने इसे प्रत्यक्ष देखा था ।। ऋष्टिभिविमलाभि कक्ष तत्र तत्र विशाम्पते । सम्पतन्तीभिराकाशमावृतं बह्बशोभत,प्रजानाथ! वहाँ गिरती हुई निर्मल ऋष्टियोंसे व्याप्त हुए आकाशकी बड़ी शोभा हो रही थी
sañjaya uvāca |
ṛṣṭibhis vimalābhiḥ khaś ca tatra tatra viśāṃ pate |
sampatantībhir ākāśam āvṛtaṃ bahu śobhat, prajānātha ||
संजय बोले—प्रजानाथ, भरतश्रेष्ठ! शूरवीरों की भुजाओं से छूटी हुई शक्तियाँ शत्रुओं पर इस प्रकार गिरती थीं, मानो आकाश से तारे टूट-टूटकर बरस रहे हों। कौरव और पाण्डव—दोनों पक्षों के योद्धाओं ने उसे प्रत्यक्ष देखा। नरेश! वहाँ-वहाँ गिरती हुई निर्मल ऋष्टियों से आच्छादित आकाश अत्यन्त शोभायमान हो उठा।
संजय उवाच