अध्याय २२ — अमर्याद-युद्धवर्णन
Unrestrained Battle Description and Śakuni’s Rear Assault
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें सात्यकि और कृतवर्गाका युद्धविषयक इकक््कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,नानाबाणैर्महाराज प्रमुक्तै: सर्वतोदिशम् । नाज्ञायन्त रणे वीरा न दिश: प्रदिश: कुतः महाराज! रणक्षेत्रमें कुपित हुए द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने सम्पूर्ण दिशाओंमें छोड़े गये अनेक प्रकारके बाणोंद्वारा भीमसेनको आगे बढ़नेसे रोक दिया। उस समय संग्राममें न तो वीरोंकी पहचान होती थी और न दिशाओंकी, फिर अवान्तर-दिशाओं (कोणों)-की तो बात ही क्या है?
nānābāṇair mahārāja pramuktaiḥ sarvatodiśam | nājñāyanta raṇe vīrā na diśaḥ pradiśaḥ kutaḥ ||
संजय बोले—महाराज! जब नाना प्रकार के असंख्य बाण चारों दिशाओं में छोड़े गए, तब रणभूमि ऐसी उलझन में पड़ गई कि न तो वीरों की पहचान हो पाती थी, न दिशाओं का ज्ञान—फिर कोण-दिशाओं की तो बात ही क्या। उसी कोलाहल में द्रोणपुत्र क्रुद्ध अश्वत्थामा ने सर्वतोमुख बाण-वर्षा से भीमसेन की आगे बढ़ती गति को रोक दिया।
संजय उवाच