धृतराष्ट्रविलापः — Dhṛtarāṣṭra’s Lament and Inquiry (Śalya-parva, Adhyāya 2)
आवलन्त्यो निहतो यत्र त्रैगर्तक्ष जनाधिप: । संशप्तकाश्न निहता: किमन्यद् भागधेयत:ः,जहाँ बृहद्वल, महाबली मगधनरेश, धनुर्धरोंके आदर्श एवं पराक्रमी उग्रायुध, अवन्तीके राजकुमार, त्रिगर्तनरेश सुशर्मा तथा सम्पूर्ण संशप्तक योद्धा मार डाले गये, वहाँ भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है?
āvalantyo nihato yatra traigartaka-janādhipaḥ | saṁśaptakāś ca nihatāḥ kim anyad bhāgadhayataḥ ||
जहाँ अवन्ती का राजकुमार अवन्त्य मारा गया, जहाँ त्रिगर्तों का अधिपति भी गिर पड़ा, और जहाँ संशप्तक योद्धा भी निहत हो गये—वहाँ भाग्य के सिवा और क्या कारण हो सकता है?
धघतयाट्र उवाच