शल्यपर्वणि प्रथमाध्यायः — Karṇa-vadha-anantaraṃ Śalya-niyogaḥ, Saṃjayasya Dhṛtarāṣṭra-nivedanam
स दैवं बलवन्मत्वा भवितव्यं च पार्थिव: । संग्रामे निश्चयं कृत्वा पुनर्युद्धाय निर्यया,उस राजा दुर्योधनने दैव और भवितव्यताको प्रबल मानकर संग्राम जारी रखनेका ही दृढ़ निश्चय करके पुनः युद्धके लिये प्रस्थान किया
sa daivaṁ balavan matvā bhavitavyaṁ ca pārthivaḥ | saṅgrāme niścayaṁ kṛtvā punar yuddhāya niryayau ||
दैव और भवितव्य को प्रबल मानकर उस पार्थिव ने संग्राम में दृढ़ निश्चय किया और पुनः युद्ध के लिए प्रस्थान किया।
वैशम्पायन उवाच