अध्याय ९ — दुर्योधनस्य अन्त्यावस्था, विलापः, तथा सौप्तिक-प्रतिवृत्तम्
Duryodhana’s Final Condition, Lamentation, and the Night’s Report
राजेन्द्र! उन्होंने देखा कि राजाकी जाँचें टूट गयी हैं। ये बड़े कष्टसे प्राण धारण करते हैं। इनकी चेतना लुप्त-सी हो गयी है और ये अपने मुँहसे पृथ्वीपर खून उगल रहे हैं। इन्हें चट कर जानेके लिये बहुत-से भयंकर दिखायी देनेवाले हिंसक जीव और कुत्ते चारों ओरसे घेरकर आसपास ही खड़े हैं। ये अपनेको खा जानेकी इच्छा रखनेवाले उन हिंसक जन्तुओंको बड़ी कठिनाईसे रोकते हैं। इन्हें बड़ी भारी पीड़ा हो रही है
taṁ śayānaṁ tathā dṛṣṭvā bhūmau surudhirokṣitam | hataśiṣṭās trayo vīrāḥ śokārtāḥ paryavārayan ||
संजय बोले—राजेन्द्र! उन्होंने देखा कि राजा की जाँघें टूट गई हैं; वह बड़े कष्ट से प्राण धारण कर रहा है, चेतना लुप्त-सी हो गई है, और मुख से पृथ्वी पर रक्त उगल रहा है। उसे चट कर जाने को बहुत-से भयानक हिंसक जीव और कुत्ते चारों ओर से घेरकर पास ही खड़े हैं। वह अपने को खा जाने की इच्छा रखने वाले उन जन्तुओं को बड़ी कठिनाई से रोक रहा है; तीव्र पीड़ा के कारण वह पृथ्वी पर पड़े-पड़े छटपटा रहा है। उसे इस प्रकार भूमि पर रक्त से सना पड़ा देखकर, शोकाकुल तीन शेष बचे वीर उसके चारों ओर खड़े हो गए।
संजय उवाच
The verse highlights the ethical aftermath of war: survival does not equal triumph. The remaining warriors are overwhelmed by grief, suggesting that violence leaves moral and emotional devastation even for those who endure.
Sañjaya describes a fallen figure lying on the ground, soaked in blood. Three warriors who have survived the slaughter gather around him, distressed and sorrowful, marking a grim battlefield aftermath.