सौप्तिकपर्व — धृष्टद्युम्नसारथिवृत्तान्तः
Report of the Night Raid and Yudhiṣṭhira’s Lament
यज्जित्वा तप्यते पश्चादापन्न इव दुर्मति: । कथं मन्येत विजयं ततो जिततर: परै:
जिस विजय को पाकर दुर्बुद्धि मनुष्य बाद में विपत्ति में पड़े हुए की भाँति तपता और पछताता है, वह उस जीत को जीत कैसे माने? क्योंकि उस दशा में तो वह शत्रुओं द्वारा और भी अधिक पराजित हो चुका होता है।
सूत उवाच