मा कुलस्य क्षये घोरे कारणं त्वं भविष्यसि । बद्धं सेतुं को नु भिन्द्याद् धमेच्छान्तं च पावकम्,“इस कुलके भयंकर विनाशमें स्वयं ही कारण न बनिये। भरतश्रेष्ठ! बँधे हुए पुलको कौन तोड़ेगा? बुझी हुई वैरकी आगको फिर कौन भड़कायेगा? कुन्तीके शान्तिपरायण पुत्रोंकी फिर कुपित करनेका साहस कौन करेगा? अजमीढकुलके रत्न! आप सब कुछ जानते और याद रखते हैं, तो भी मैं पुन आपको स्मरण दिलाती रहूँगी
mā kulasya kṣaye ghore kāraṇaṁ tvaṁ bhaviṣyasi | baddhaṁ setuṁ ko nu bhindyād dhamecchāntaṁ ca pāvakam ||
इस कुल के भयंकर क्षय का कारण आप स्वयं न बनिए। हे भरतश्रेष्ठ! बँधा हुआ सेतु कौन तोड़ेगा? और बुझी हुई आग को फिर कौन भड़काएगा?
वैशम्पायन उवाच