Kuntī’s Consolation to Draupadī and Lament for the Dispossessed Pandavas (सभा पर्व, अध्याय 70)
न हि मुच्येत मे जीवन् पदा भूमिमुपस्पृशन् | मर्त्यधर्मा परामृश्य पाज्चाल्या मूर्थजानिमान्,ये हमारे पुण्य, तप और प्राणोंके भी प्रभु हैं। यदि ये द्रौपदीको दाँवपर लगानेसे पूर्व अपनेको हारा हुआ नहीं मानते हैं तो हम सब लोग इनके द्वारा दाँवपर रखे जानेके कारण हारे जा चुके हैं। यदि मैं हारा गया न होता तो अपने पैरोंसे पृथ्वीका स्पर्श करनेवाला कोई भी मरणथधर्मा मनुष्य द्रौपदीके इन केशोंको छू लेनेपर मेरे हाथसे जीवित नहीं बच सकता था। राजाओ! परिघके समान मोटी और गोलाकार मेरी इन विशाल भुजाओंकी ओर तो देखो। इनके बीचमें आकर इन्द्र भी जीवित नहीं बच सकता
na hi mucyeta me jīvan padā bhūmim upaspṛśan | martyadharmā parāmṛśya pāñcālyā mūrdhajān imān |
भीमसेन ने कहा—पृथ्वी पर चलने वाला कोई भी मर्त्य, यदि पाञ्चाली के इन केशों को छूता, तो मेरे हाथों से जीवित न छूटता। यदि मैं पराजय के अपमान से बँधा न होता, तो यह अपराध दण्ड से वंचित न रहता।
भीमसेन उवाच