सभा-पर्यवसान-प्रस्थानवचनम् | Counsel at the Point of Departure
वैशम्पायन उवाच सा तेन च समाधूता दुःखेन च तपस्विनी । पतिता विललापेदं सभायामतथोचिता,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! दुशासनके बार-बार खींचनेसे तपस्विनी द्रौपदी पृथ्वीपर गिर पड़ी और उस सभामें अत्यन्त दु:खित हो विलाप करने लगी। वह जिस दुरवस्थामें पड़ी थी, उसके योग्य कदापि न थी
vaiśampāyana uvāca sā tena ca samādhūtā duḥkhena ca tapasvinī | patitā vilalāpedam sabhāyām atathocitā ||
वैशम्पायन बोले—जनमेजय! उसके द्वारा बार-बार घसीटे जाने से तपस्विनी द्रौपदी दुःख से अभिभूत होकर भूमि पर गिर पड़ी। उस राजसभा में, जो दशा उसके लिए सर्वथा अयोग्य थी, उसी में वह करुण विलाप करने लगी।
वैशम्पायन उवाच