Sabhā Parva, Adhyāya 68 — Pāṇḍavānāṃ Vanavāsa-prasthānaḥ; Duḥśāsana-nindā; Pāṇḍava-pratijñāḥ
इत्यनुस्मृत्य कृष्णं सा हरिं त्रिभुवने श्वरम् । प्रारुदद् दु:खिता राजन् मुखमाच्छाद्य भामिनी,राजन! इस प्रकार तीनों लोकोंके स्वामी श्यामसुन्दर श्रीकृष्णका बार-बार चिन्तन करके मानिनी द्रौपदी दुःखी हो अंचलसे मुँह ढककर जोर-जोरसे रोने लगी
ity anusmṛtya kṛṣṇaṃ sā hariṃ tribhuvaneśvaram | prārudad duḥkhitā rājan mukham ācchādya bhāminī ||
राजन्! इस प्रकार त्रिभुवनेश्वर हरि श्रीकृष्ण का बार-बार स्मरण करके दुःख से व्याकुल वह मानिनी (द्रौपदी) अपने वस्त्र से मुख ढककर फूट-फूटकर रो पड़ी।
वैशम्पायन उवाच