Sabhā Parva, Adhyāya 68 — Pāṇḍavānāṃ Vanavāsa-prasthānaḥ; Duḥśāsana-nindā; Pāṇḍava-pratijñāḥ
इयं च कीर्तिता कृष्णा सौबलेन पणार्थिना । एतत् सर्व विचार्याहं मन्ये न विजितामिमाम्
सब दाँव जीतने की इच्छा रखने वाले सुबलपुत्र शकुनि ने ही द्रौपदी (कृष्णा) को दाँव पर लगाने की बात उठाई। इन सब बातों पर विचार करके मैं कृष्णा को जीती हुई नहीं मानता।
वैशम्पायन उवाच