अध्याय ६६: पुनर्द्यूत-प्रस्तावः
Proposal for a Renewed Dice Game
विदुर उवाच दुर्विभाषं भाषितं त्वादृशेन न मन्द सम्बुध्यसि पाशबद्ध: । प्रपाते त्वं लम्बमानो न वेत्सि व्याप्रान मृरः कोपयसे5तिवेलम्
vidura uvāca durvibhāṣaṃ bhāṣitaṃ tvādṛśena na manda saṃbudhyasi pāśabaddhaḥ | prapāte tvaṃ lambamāno na vetsi vyāprān mṛgaḥ kopayase'tivelam ||
विदुर बोले—तुम-जैसे व्यक्ति के मुख से ऐसा कठोर और अनुचित वचन निकला है; पर तुम मोह-रज्जु से बँधे होने के कारण कुछ समझते नहीं। तुम खाई के ऊपर लटके हो, फिर भी अपना संकट नहीं जानते; जैसे कोई मृग, तुम व्याघ्रों को अति-सीमा तक क्रुद्ध कर रहे हो।
विदुर उवाच