अध्याय ६४ — सभामध्ये क्रोध-निवारणम्
Restraint of wrath in the royal assembly
अव्याधिजं कटुजं तीक्ष्णमुष्णं यशोमुषं परुष॑ पूतिगन्धि । सतां पेयं यन्न पिबन्त्यसन्तो मन्युं महाराज पिब प्रशाम्य,महाराज! जो पी लेनेपर मानसिक रोगोंका नाश करनेवाला है, कड़वी बातोंसे जिसकी उत्पत्ति होती है, जो तीखा, तापदायक, कीर्तिनाशक, कठोर और दूषित प्रतीत होता है, जिसे दुष्टलोग नहीं पी सकते तथा जो सत्पुरुषोंके पीनेकी वस्तु है, उस क्रोधको पीकर शान्त हो जाइये
avyādhijaṁ kaṭujaṁ tīkṣṇam uṣṇaṁ yaśomuṣaṁ paruṣaṁ pūtigandhi | satāṁ peyaṁ yan na pibanty asanto manyuṁ mahārāja piba praśāmya ||
महाराज! जो पी लेने पर मानसिक रोगों का नाश करने वाला है, कड़वी बातों से जिसकी उत्पत्ति होती है, जो तीखा, तापदायक, कीर्तिनाशक, कठोर और दूषित-गन्ध वाला प्रतीत होता है; जिसे असत् लोग पी नहीं सकते और जो सत्पुरुषों के पीने योग्य है—उस क्रोध को पीकर आप शान्त हो जाइए।
विदुर उवाच