अक्षदेवन-प्रवर्तनम् | Commencement of the Dice Game
एवं दृष्टवा नाभिविन्दामि शर्म समीक्षमाणो<पि कुरुप्रवीर । तेनाहमेवं कृशतां गतश्न विवर्णतां चैव सशोकतां च,कुरुप्रवीर! ऐसा देखकर अच्छी तरह विचार करनेपर भी मुझे चैन नहीं पड़ता। इसीसे मैं दुर्बल, कान्तिहीन और शोकमग्न हो रहा हूँ
evaṁ dṛṣṭvā nābhivindāmi śarma samīkṣamāṇo ’pi kurupravīra | tenāham evaṁ kṛśatāṁ gataś ca vivarṇatāṁ caiva saśokatāṁ ca ||
कुरुप्रवीर! यह सब देखकर और भली-भाँति विचार करने पर भी मुझे चैन नहीं मिलता। इसी कारण मैं दुर्बल, कान्तिहीन और शोकमग्न होता जा रहा हूँ।
दुर्योधन उवाच