Adhyāya 39: Śiśupāla’s Censure and Bhīma’s Contained Wrath (शिशुपाल-निन्दा तथा भीमक्रोध-निग्रहः)
मतिमन्तश्न ये केचिदाचार्य पितरं गुरुम्,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है
matimantaś ca ye kecid ācāryaṃ pitaraṃ gurum | sa eva hi mayā vadhyo bhaviṣyati na saṃśayaḥ ||
राजाओ! तुममें जो कोई—चाहे कितना ही बुद्धिमान क्यों न हो—मेरे द्वारा पूजित श्रीकृष्ण के सम्मान को सहन नहीं करता और उसके विरुद्ध खड़ा होता है, वही मेरे द्वारा वध के योग्य होगा; इसमें संशय नहीं।
वैशम्पायन उवाच