Adhyāya 39: Śiśupāla’s Censure and Bhīma’s Contained Wrath (शिशुपाल-निन्दा तथा भीमक्रोध-निग्रहः)
स्थित: सेनापतिर्यो5हं मन्यध्वं कि तु साम्प्रतम् । युधि तिष्ठाम संनहा समेतान् वृष्णिपाण्डवान्,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है 'भूमिपालो! मैं सबका सेनापति बनकर खड़ा हूँ। अब तुमलोग किस चिन्तामें पड़े हो। आओ, हम सब लोग युद्धके लिये सुसज्जित हो पाण्डवों और यादवोंकी सम्मिलित सेनाका सामना करनेके लिये डट जाये
sthitaḥ senāpatir yo 'haṃ manyadhvaṃ kiṃ tu sāmpratam | yudhi tiṣṭhāma saṃnahā sametān vṛṣṇipāṇḍavān, sa eva hi mayā vadhyo bhaviṣyati na saṃśayaḥ |
“भूमिपालो! मैं तुम्हारा सेनापति बनकर खड़ा हूँ; फिर अब तुम किस विचार में पड़े हो? आओ, हम सब शस्त्र-सज्जित होकर युद्ध में डटें और वृष्णियों तथा पाण्डवों की संयुक्त सेना का सामना करें। जो मेरे सामने आएगा, वही मेरे द्वारा वध के योग्य होगा—इसमें संशय नहीं।”
वैशम्पायन उवाच