Śiśupāla-nigraha-prastāva: Yudhiṣṭhira’s Conciliation and Bhīṣma’s Defense of Kṛṣṇa
Book 2, Chapter 35
द्रष्टकामा: सभां चैव धर्मराजं युधिष्ठिरम् । न कश्चिदाहरत् तत्र सहस्रावरमर्हणम्,धर्मराज युधिष्ठिरको और उनकी सभाको देखनेकी इच्छासे आये हुए राजाओंमेंसे कोई भी ऐसा नहीं था, जो एक हजार स्वर्णमुद्राओंसे कम भेंट लाया हो
draṣṭakāmāḥ sabhāṃ caiva dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram | na kaścid āharat tatra sahasrāvaram arhaṇam ||
धर्मराज युधिष्ठिर और उनकी सभा को देखने की इच्छा से आए राजाओं में वहाँ कोई भी ऐसा न था जो एक हजार स्वर्णमुद्राओं से कम मूल्य की भेंट लाया हो।
वैशम्पायन उवाच