Adhyāya 33: Antarvedī-Samāgama, Arghya-Nirṇaya, and Śiśupāla’s Objection
वैशम्पायन उवाच त॑ं कृष्ण: प्रत्युवाचेदं बहूकत्वा गुणविस्तरम् । त्वमेव राजशार्दूल सम्राडहों महाक्रतुम् । सम्प्राप्रुहि त्वया प्राप्ते कृतकृत्यास्ततो वयम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तब भगवान् श्रीकृष्णने राजसूययज्ञके गुणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन करके उनसे इस प्रकार कहा--'राजसिंह! आप सम्राट होने योग्य हैं, अतः आप ही इस महान् यज्ञकी दीक्षा ग्रहण कीजिये। आपके दीक्षा लेनेपर हम सबलोग कृतकृत्य हो जायँगे
vaiśampāyana uvāca | taṃ kṛṣṇaḥ pratyuvācedaṃ bahūkṛtvā guṇavistaram | tvam eva rājaśārdūla samrāḍ arho mahākratum | samprāpnuhi tvayā prāpte kṛtakṛtyās tato vayam ||
वैशम्पायन बोले—जनमेजय! तब भगवान् श्रीकृष्ण ने राजसूय के गुणों का विस्तारपूर्वक वर्णन करके कहा—“राजसिंह! सम्राट होने के योग्य आप ही हैं; अतः आप ही इस महान् यज्ञ की दीक्षा ग्रहण कीजिए। आपके दीक्षा लेने पर हम सब कृतकृत्य हो जाएँगे।”
वैशम्पायन उवाच