Adhyāya 31: Rājasūya-samāgama — The Gathering of Kings and the Ordering of Hospitality
ततो रथा हया नागा: पुरुषा: कवचानि च । प्रदीप्तानि व्यदृश्यन्त सहदेवबले तदा,उस समय सहदेवकी सेनामें रथ, घोड़े, हाथी, मनुष्य और कवच सभी आगसे जलते दिखायी देने लगे
tato rathā hayā nāgāḥ puruṣāḥ kavacāni ca | pradīptāni vyadṛśyanta sahadevabale tadā ||
तब सहदेव की सेना में रथ, घोड़े, हाथी, मनुष्य और कवच—सब आग से प्रदीप्त दिखाई देने लगे।
वैशम्पायन उवाच