Rājasūya-sambhāra: Prosperity under Rājadharma and the Initiation of Yudhiṣṭhira’s Sacrifice
ततो दक्षिणमल्लांश्व भोगवन्तं च पर्वतम् । तरसैवाजयद् भीमो नातितीव्रेण कर्मणा,फिर क्रमशः भगर्गोंके स्वामी, निषादोंके अधिपति तथा मणिमान् आदि बहुत-से भूपालोंको अपने अधिकारमें कर लिया। तदनन्तर दक्षिण मल्लदेश तथा भोगवान् पर्वतको भीमसेनने अधिक प्रयास किये बिना ही वेगपूर्वक जीत लिया
tato dakṣiṇa-mallānś ca bhogavantaṃ ca parvatam | tarasaivājayad bhīmo nātitīvreṇa karmaṇā |
वैशम्पायन बोले—तदनन्तर भीमसेन ने दक्षिण मल्लों को और भोगवान् नामक पर्वत को भी वेगपूर्वक जीत लिया; उन्होंने अत्यन्त उग्र उपायों का आश्रय न लेकर केवल बल और गति से विजय प्राप्त की। फिर क्रमशः भगर्गों के स्वामी, निषादों के अधिपति तथा मणिमान् आदि अनेक भूपालों को अपने अधिकार में कर लिया और पाण्डवों का शासन अनुशासनपूर्वक बढ़ाया, निरर्थक क्रूरता से नहीं।
वैशम्पायन उवाच