Jarāsandha–Vāsudeva Saṃvāda: Kṣātra-Dharma, Pride, and the Ethics of Coercion
Sabhā Parva, Adhyāya 20
ईशौ हि तौ महात्मानौ सर्वकार्यप्रवर्तिनौ | धर्मकामार्थलोकानां कार्याणां च प्रवर्तकौ,क्योंकि वे दोनों महात्मा निमेष-उन्मेषसे लेकर महाप्रलयपर्यन्त समस्त कार्योंके नियन्ता तथा धर्म, काम और अर्थसाधनमें लगे हुए लोगोंको तत्सम्बन्धी कार्योमें लगानेवाले ईश्वर (नर-नारायण) हैं
īśau hi tau mahātmānau sarvakāryapravartinau | dharmakāmārthalokānāṃ kāryāṇāṃ ca pravartakau ||
वैशम्पायन बोले—वे दोनों महात्मा वास्तव में ईश्वर हैं, जो समस्त कार्यों को प्रवृत्त करने वाले हैं। निमेष-उन्मेष से लेकर महाप्रलय तक सब कर्मों के नियन्ता वही हैं और धर्म, काम तथा अर्थ में लगे हुए लोगों को उनके-उनके योग्य कर्मों में प्रवृत्त करने वाले भी वही—नर और नारायण—हैं।
वैशग्पायन उवाच