Adhyaya 1
Mausala ParvaAdhyaya 132 Versesकुरुक्षेत्र-युद्धोत्तर काल; युद्ध नहीं, द्वारका के भीतर गृह-कलह/आत्म-विनाश की लहर।

Adhyaya 1

अध्याय १: उत्पात-दर्शनम् तथा वृष्णि-विनाश-श्रवणम् (Omens Observed and the Hearing of the Vṛṣṇi Destruction)

Upa-parva: Mausala-Upa-Parva (Omens and the Report of Vṛṣṇi Catastrophe)

Vaiśaṃpāyana reports that in the thirty-sixth year, King Yudhiṣṭhira observes a cluster of adverse portents: harsh winds with thunder and gravel-like rain; birds circling in inauspicious directions; great rivers seeming to flow backward; horizons veiled by mist; meteors dropping with ember-like showers; the sun obscured by dust, rising without clear rays and appearing as if marked by headless-trunk forms; and dreadful tri-colored halos around the moon and sun with ash-reddish tones. These repeated signs generate persistent anxiety. Subsequently, Yudhiṣṭhira hears that the Vṛṣṇi host has been destroyed in a ‘mausala’ episode—mutual assault interpreted as effected by brahma-daṇḍa power. He gathers his brothers to deliberate on next steps. The Pāṇḍavas are distressed; they struggle to accept the report, especially the notion of Vāsudeva’s death, described as nearly unimaginable. The chapter closes with the brothers seated in grief and shaken resolve, indicating a transition from post-war consolidation to an existential reckoning with impermanence and the limits of sovereignty.

Chapter Arc: वैशम्पायन जनमेजय को बतलाते हैं कि महाभारत-युद्ध के बाद वर्षों बीतने पर द्वारका और वृष्णि-यादवों के ऊपर अनिष्ट की छाया घिर आती है—आकाश, दिशाएँ और नदियाँ तक भय-सूचक संकेत देने लगती हैं। → भयंकर उत्पात प्रकट होते हैं—रेत और कंकड़ बरसाती आँधियाँ, अपसव्य उड़ते शकुन, कुहरे से ढकी दिशाएँ, और अंगार-वर्षिणी उल्काएँ। नगर में हृदय-उद्वेग बढ़ता है; फिर भी काल का प्रवाह रुकता नहीं। इसी बीच साम्ब के गर्भ से ‘मूसल’ का जन्म—यदुवंश-विनाश का बीज—और उसे रोकने के लिए राजाज्ञा से कठोर निषेध (सुरासव न करने का नियम) स्थापित होता है। → छत्तीसवें वर्ष ‘कालचोदित’ वृष्णि-यादव आपस में मूसलों से ही एक-दूसरे का संहार करते हैं—विनाश बाहर से नहीं, अपने ही हाथों से घटित होता है; और यह सब उन पूर्व-लक्षणों की सत्यता सिद्ध कर देता है। → राजभय और शासन से नियम बनाए जाते हैं, दंड-विधान तक घोषित होता है कि जो छिपकर नशीली वस्तु बनाएगा वह सपरिवार कठोर दंड का भागी होगा; परंतु कथा का निष्कर्ष यही है कि जगत्-प्रभु होकर भी श्रीकृष्ण ‘कृतान्त’ (नियत अंत) को अन्यथा करने की इच्छा नहीं करते—काल का विधान अपना मार्ग लेता है। → उत्पातों की घनीभूत छाया और मूसल-जन्य नियति संकेत देती है कि द्वारका का वैभव और वृष्णियों की शक्ति शीघ्र ही पूर्ण पतन की ओर बढ़ रही है।

Shlokas

Verse 1

दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये... १५॥ प अं १५॥ आश्रमवासिकपर्वकी कुल श्लोकसंख्या -- ११०९। भीकम (0) अमान साम्बके पेटसे यदुवंश-विनाशके लिये मूसल पैदा होनेका ऋषियोंद्वारा शाप ॥ ३० श्रीपरमात्मने नम: ।। श्रीमहाभारतम्‌ मौसलपर्व प्रथमो 5 ध्याय: युधिष्ठटिरका अपशकुन देखना, यादवोंके विनाशका समाचार सुनना, द्वारकामें ऋषियोंके शापवश साम्बके पेटसे मूसलकी उत्पत्ति तथा मदिराके निषेधकी कठोर आज्ञा नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्‌ | देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्‌ ।। अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान्‌ श्रीकृष्ण, (उनके नित्यसखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये ।। वैशम्पायन उवाच षट्त्रिंशे त्वथ सम्प्राप्ते वर्ष कौरवनन्दन: । ददर्श विपरीतानि निमित्तानि युधिष्ठिर:,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! महाभारत युद्धके पश्चात्‌ जब छत्तीसवाँ वर्ष प्रारम्भ हुआ तब कौरवनन्दन राजा युधिष्ठिरको कई तरहके अपशकुन दिखायी देने लगे अनायास ही महान्‌ कर्म करनेवाले बलरामजीका यह शासन समझकर सब लोगोंने राजाके भयसे यह नियम बना लिया कि “आजसे न तो मदिरा बनाना है न पीना' ।। इति श्रीमहाभारते मौसलपर्वणि मुसलोत्पत्तौ प्रथमो5ध्याय:

वैशम्पायन बोले—कौरवनन्दन! महायुद्ध के पश्चात् जब छत्तीसवाँ वर्ष आया, तब राजा युधिष्ठिर ने अनेक विपरीत अपशकुन देखे। वे संकेत मानो धर्म के क्षय की सूचना देते थे; जब धर्म ढलने लगता है, तब जगत् स्वयं ही धर्मनिष्ठों को भयावह चिन्हों से सावधान करता है।

Verse 2

ववुर्वाताश्व निर्घाता रूक्षा: शर्करवर्षिण: । अपसव्यानि शकुना मण्डलानि प्रचक्रिरे,बिजलीकी गड़गड़ाहटके साथ बालू और कंकड़ बरसानेवाली प्रचण्ड आँधी चलने लगी। पक्षी दाहिनी ओर मण्डल बनाकर उड़ते दिखायी देने लगे

कठोर, प्रचण्ड वायु गर्जना के साथ चलने लगी और बालू-कंकड़ बरसाने लगी। पक्षी भी अपसव्य होकर मण्डल बनाकर उड़ने लगे। ये सब संकेत लोक-व्यवस्था और प्रकृति-क्रम के विक्षोभ को प्रकट करते थे और आने वाली महाविपत्ति की पूर्वसूचना देते थे।

Verse 3

प्रत्यगूहुर्महानद्यो दिशो नीहारसंवृता: । उल्काश्चाज्रारवर्षिण्य: प्रापतन्‌ गगनाद्‌ भुवि

महानदियाँ मानो उलटी बहने लगीं, दिशाएँ कुहासे से ढँक गयीं और भयानक शब्द करती हुई ज्वलन्त उल्काएँ आकाश से पृथ्वी पर गिरने लगीं। प्रकृति के ये उलटफेर धर्म-व्यवस्था के विक्षोभ के सूचक थे और यदुवंश के भीतर ही भीतर बढ़ते संयम-क्षय से होने वाले विनाश की पूर्वछाया थे।

Verse 4

बड़ी-बड़ी नदियाँ बालूके भीतर छिपकर बहने लगीं। दिशाएँ कुहरेसे आच्छादित हो गयीं। आकाशसे पृथ्वीपर अंगार बरसानेवाली उल्काएँ गिरने लगीं ।। आदित्यो रजसा राजन्‌ समवच्छन्नमण्डल: । विरश्मिरुदये नित्यं कबन्धै: समदृश्यत,राजन! सूर्यमण्डल धूलसे आच्छन्न हो गया था। उदयकालनमें सूर्य तेजोहीन प्रतीत होते थे और उनका मण्डल प्रतिदिन अनेक कबन्धों (बिना सिरके धड़ों)-से युक्त दिखायी देता था

वैशम्पायन बोले—राजन्, सूर्य का मण्डल धूल से पूरी तरह आच्छन्न हो गया था। उदय के समय वह किरणहीन-सा प्रतीत होता और प्रतिदिन अनेक कबन्धों—बिना सिर के धड़ों—के साथ दिखायी देता। तब बड़ी-बड़ी नदियाँ बालू के भीतर छिपकर बहने लगीं, दिशाएँ कुहरे से ढक गयीं और आकाश से पृथ्वी पर अंगार बरसाने वाली उल्काएँ गिरने लगीं।

Verse 5

परिवेषाश्र दृश्यन्ते दारुणाश्रन्द्रसूर्ययो: । त्रिवर्णि: श्यामरूक्षान्तास्तथा भस्मारुणप्रभा:,चन्द्रमा और सूर्य दोनोंके चारों ओर भयानक घेरे दृष्टिगोचर होते थे। उन घेरोंमें तीन रंग प्रतीत होते थे। उनका किनारेका भाग काला एवं रूखा होता था। बीचमें भस्मके समान धूसर रंग दीखता था और भीतरी किनारेकी कान्ति अरुणवर्णकी दृष्टिगोचर होती थी

वैशम्पायन बोले—चन्द्रमा और सूर्य दोनों के चारों ओर भयानक परिवेष (घेरे) दिखाई देते थे। वे तीन रंगों के थे—बाहरी किनारा काला और रूखा, बीच का भाग भस्म-सा धूसर, और भीतर की परिधि अरुण-लाल आभा से चमकती। आकाश के ये अपशकुन पृथ्वी पर होने वाले धर्म-भंग और लोक-व्यवस्था के विघटन का संकेत दे रहे थे।

Verse 6

एते चान्ये च बहव उत्पाता भयशंसिन: । दृश्यन्ते बहवो राजन्‌ हृदयोद्वेगकारका:

वैशम्पायन बोले—राजन्, ये और ऐसे ही बहुत-से भयसूचक उत्पात बड़ी संख्या में दिखाई दे रहे हैं; वे हृदय को उद्विग्न कर देने वाले हैं।

Verse 7

राजन! ये तथा और भी बहुत-से भयसूचक उत्पात दिखायी देने लगे, जो हृदयको उद्विग्न कर देनेवाले थे ।। कस्यचित्‌ त्वथ कालस्य कुरुराजो युधिष्ठिर: । शुश्राव वृष्णिचक्रस्य मौसले कदनं कृतम्‌,इसके थोड़े ही दिनों बाद कुरुराज युधिष्ठिरने यह समाचार सुना कि मूसलको निमित्त बनाकर आपसमें महान्‌ युद्ध हुआ है; जिसमें समस्त वृष्णिवंशियोंका संहार हो गया। केवल भगवान्‌ श्रीकृष्ण और बलरामजी ही उस विनाशसे बचे हुए हैं। यह सब सुनकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिने अपने समस्त भाइयोंको बुलाया और पूछा--'अब हमें क्‍या करना चाहिये?

राजन्, इस प्रकार हृदय को उद्विग्न कर देने वाले बहुत-से भयसूचक उत्पात दिखाई देने लगे। फिर कुछ ही समय बाद कुरुराज युधिष्ठिर ने यह समाचार सुना कि वृष्णियों के बीच मूसल को निमित्त बनाकर परस्पर भयंकर संहार हुआ है—एक विनाशकारी गृहकलह, जिसने उनके समूचे समुदाय को नष्ट कर दिया।

Verse 8

विमुक्तं वासुदेवं च श्रुत्वा रामं च पाण्डव: । समानीयाब्रवीद्‌ भ्रातृन्‌ किं करिष्याम इत्युत,इसके थोड़े ही दिनों बाद कुरुराज युधिष्ठिरने यह समाचार सुना कि मूसलको निमित्त बनाकर आपसमें महान्‌ युद्ध हुआ है; जिसमें समस्त वृष्णिवंशियोंका संहार हो गया। केवल भगवान्‌ श्रीकृष्ण और बलरामजी ही उस विनाशसे बचे हुए हैं। यह सब सुनकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिने अपने समस्त भाइयोंको बुलाया और पूछा--'अब हमें क्‍या करना चाहिये?

वैशम्पायन बोले—वासुदेव (श्रीकृष्ण) के बच जाने और राम (बलराम) के भी सुरक्षित रहने का समाचार सुनकर पाण्डव युधिष्ठिर ने अपने भाइयों को बुलाया और कहा—“अब हम क्या करें?”

Verse 9

परस्परं समासाद्य ब्रह्मदण्डबलात्‌ कृतान्‌ । वृष्णीन्‌ विनष्टांस्ते श्रुत्वा व्यथिता: पाण्डवाभवन्‌,ब्राह्मणोंक शापके बलसे विवश हो आपसमें लड़-भिड़कर सारे वृष्णिवंशी विनष्ट हो गये। यह बात सुनकर पाण्डवोंको बड़ी वेदना हुई। भगवान्‌ श्रीकृष्णका वध तो समुद्रको सोख लेनेके समान असम्भव था; अतः उन वीरोंने भगवान्‌ श्रीकृष्णके विनाशकी बातपर विश्वास नहीं किया

वैशम्पायन बोले— ब्राह्मण के शापरूप दण्ड की अजेय शक्ति से विवश होकर वे परस्पर भिड़ पड़े और युद्ध में समस्त वृष्णिवंशी नष्ट हो गए। यह समाचार सुनकर पाण्डव अत्यन्त व्याकुल हो उठे। श्रीकृष्ण का निधन तो मानो समुद्र को सुखा देने के समान असम्भव था; इसलिए उन वीरों ने भगवान् श्रीकृष्ण के विनाश की बात सहज ही स्वीकार नहीं की।

Verse 10

निधन वासुदेवस्य समुद्रस्येव शोषणम्‌ । वीरा न श्रद्दधधुस्तस्य विनाशं शार्ज्र्धन्चन:,ब्राह्मणोंक शापके बलसे विवश हो आपसमें लड़-भिड़कर सारे वृष्णिवंशी विनष्ट हो गये। यह बात सुनकर पाण्डवोंको बड़ी वेदना हुई। भगवान्‌ श्रीकृष्णका वध तो समुद्रको सोख लेनेके समान असम्भव था; अतः उन वीरोंने भगवान्‌ श्रीकृष्णके विनाशकी बातपर विश्वास नहीं किया

वैशम्पायन बोले— वासुदेव का निधन तो समुद्र के सूख जाने के समान असम्भव था; इसलिए उन वीरों ने शार्ङ्गधन्वा (श्रीकृष्ण) के विनाश का वृत्तान्त विश्वासपूर्वक नहीं माना।

Verse 11

मौसलं ते समाश्रित्य दुःखशोकसमन्विता: । विषण्णा हतसंकल्पा: पाण्डवा: समुपाविशन्‌,इस मौसलकाण्डकी बातको लेकर सारे पाण्डव दुःख-शोकमें डूब गये। उनके मनमें विषाद छा गया और वे हताश हो मन मारकर बैठ गये

मौसलकाण्ड की यह बात सुनकर पाण्डव दुःख-शोक से भर गए। वे विषण्ण हो गए, उनका संकल्प टूट गया, और निराश होकर वे वहीं बैठ गए।

Verse 12

जनमेजय उवाच कथं विनष्टा भगवन्नन्धका वृष्णिभि: सह | पश्यतो वासुदेवस्य भोजाश्वचैव महारथा:,जनमेजयने पूछा--भगवन्‌! भगवान्‌ श्रीकृष्णके देखते-देखते वृष्णियोंसहित अन्धक तथा महारथी भोजवंशी क्षत्रिय कैसे नष्ट हो गये?

जनमेजय ने पूछा— भगवन्! वासुदेव के देखते-देखते वृष्णियों के साथ अन्धक कैसे नष्ट हो गए? और वे महारथी भोज भी कैसे विनष्ट हुए?

Verse 13

वैशग्पायन उवाच षट्त्रिंशेड्थ ततो वर्षे वृष्णीनामनयो महान्‌ । अन्योन्यं मुसलैस्ते तु निजघ्नु: कालचोदिता:,वैशम्पायनजीने कहा--राजन्‌! महाभारतयुद्धके बाद छत्तीसवें वर्ष वृष्णिवंशियोंमें महान्‌ अन्यायपूर्ण कलह आरम्भ हो गया। उसमें कालसे प्रेरित होकर उन्होंने एक-दूसरेको मूसलों (अरों)-से मार डाला

वैशम्पायन बोले— तत्पश्चात छत्तीसवें वर्ष वृष्णियों में महान् अधर्ममय कलह उठ खड़ा हुआ। काल से प्रेरित होकर उन्होंने मूसलों से एक-दूसरे को मार डाला।

Verse 14

जनमेजय उवाच केनानुशप्तास्ते वीरा: क्षयं वृष्ण्यन्धका गता: । भोजाश्ष द्विजवर्य त्वं विस्तरेण वदस्व मे,जनमेजयने पूछा--विप्रवर! वृष्णि, अन्धक तथा भोजवंशके उन वीरोंको किसने शाप दिया था जिससे उनका संहार हो गया? आप यह प्रसंग मुझे विस्तारपूर्वक बताइये

जनमेजय ने कहा—हे द्विजश्रेष्ठ! उन वीरों को किसने शाप दिया था, जिससे वृष्णि और अन्धक विनाश को प्राप्त हुए—और भोज भी? आप यह प्रसंग मुझे विस्तार से बताइए।

Verse 15

वैशम्पायन उवाच विश्वामित्रं च कण्वं च नारंद च तपोधनम्‌ । सारणप्रमुखा वीरा ददृशुर्द्धारकां गतान्‌,वैशम्पायनजीने कहा--राजन्‌! एक समयकी बात है, महर्षि विश्वामित्र, कण्व और तपस्याके धनी नारदजी द्वारकामें गये हुए थे। उस समय दैवके मारे हुए सारण आदि वीर साम्बको स्त्रीके वेषमें विभूषित करके उनके पास ले गये। उन सबने उन मुनियोंका दर्शन किया और इस प्रकार पूछा--

वैशम्पायन ने कहा—राजन्! महर्षि विश्वामित्र, कण्व और तपोधन नारद द्वारका गए थे। तब सारण आदि वीर, दैववश, साम्ब को स्त्री-वेष से सुसज्जित करके उन मुनियों के पास ले गए। मुनियों का दर्शन करके उन्होंने प्रश्न किया।

Verse 16

ते तान्‌ साम्बं पुरस्कृत्य भूषयित्वा स्त्रियं यथा । अब्रुवन्नुपसंगम्य दैवदण्डनिपीडिता:,वैशम्पायनजीने कहा--राजन्‌! एक समयकी बात है, महर्षि विश्वामित्र, कण्व और तपस्याके धनी नारदजी द्वारकामें गये हुए थे। उस समय दैवके मारे हुए सारण आदि वीर साम्बको स्त्रीके वेषमें विभूषित करके उनके पास ले गये। उन सबने उन मुनियोंका दर्शन किया और इस प्रकार पूछा--

वैशम्पायन ने कहा—राजन्! दैवदण्ड से पीड़ित वे लोग साम्ब को आगे करके, उसे स्त्री के समान सजा-धजा कर, मुनियों के पास जाकर बोले।

Verse 17

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“महर्षियो! यह स्त्री अमित तेजस्वी बभ्रु की पत्नी है। बभ्रु पुत्र की कामना करता है। आप ऋषि हैं—भलीभाँति विचारकर बताइए, यह अपने गर्भ से क्या उत्पन्न करेगी?”

Verse 18

इत्युक्तास्ते तदा राजन्‌ विप्रलम्भप्रधर्षिता: । प्रत्यब्रुवंस्तान्‌ मुनयो यत्‌ तच्छुणु नराधिप,राजन! नरेश्वर! ऐसी बात कहकर उन यादवोंने जब ऋषियोंको धोखा दिया और इस प्रकार उनका तिरस्कार किया तब उन्होंने उन बालकोंको जो उत्तर दिया, उसे सुनो

वैशम्पायन ने कहा—राजन्! जब उन यादवों ने इस प्रकार कहकर छल-उपहास से ऋषियों का अपमान किया, तब मुनियों ने उन युवकों को जो उत्तर दिया, वह सुनिए, हे नराधिप।

Verse 19

वृष्ण्यन्धकविनाशाय मुसलं घोरमायसम्‌ | वासुदेवस्य दायाद: साम्बो5यं जनयिष्यति,राजन! जन दुर्बुद्धि बालकोंके वज्चनापूर्ण बर्तावसे वे सभी महर्षि कुपित हो उठे। क्रोधसे उनकी आँखें लाल हो गयीं और वे एक-दूसरेकी ओर देखकर इस प्रकार बोले -- क्रूर, क्रोधी और दुराचारी यादवकुमारो! भगवान्‌ श्रीकृष्णका यह पुत्र साम्ब एक भयंकर लोहेका मूसल उत्पन्न करेगा जो वृष्णि और अन्धकवंशके विनाशका कारण होगा। उसीसे तुम लोग बलराम और श्रीकृष्णके सिवा अपने शेष समस्त कुलका संहार कर डालोगे। हलधारी श्रीमान्‌ बलरामजी स्वयं ही अपने शरीरको त्यागकर समुद्रमें चले जायँगे और महात्मा श्रीकृष्ण जब भूतलपर सो रहे होंगे उस समय जरा नामक व्याध उन्हें अपने बाणोंसे बींध डालेगा

वैशम्पायन बोले—राजन्! वृष्णि और अन्धक वंश के विनाश के लिए वासुदेव का यह दायाद साम्ब एक भयंकर लोहे का मूसल उत्पन्न करेगा।

Verse 20

येन यूयं सुदुर्वत्ता नृशंसा जातमन्यव: । उच्छेत्तार: कुलं कृत्स्नमृते रामजनार्दनी,राजन! जन दुर्बुद्धि बालकोंके वज्चनापूर्ण बर्तावसे वे सभी महर्षि कुपित हो उठे। क्रोधसे उनकी आँखें लाल हो गयीं और वे एक-दूसरेकी ओर देखकर इस प्रकार बोले -- क्रूर, क्रोधी और दुराचारी यादवकुमारो! भगवान्‌ श्रीकृष्णका यह पुत्र साम्ब एक भयंकर लोहेका मूसल उत्पन्न करेगा जो वृष्णि और अन्धकवंशके विनाशका कारण होगा। उसीसे तुम लोग बलराम और श्रीकृष्णके सिवा अपने शेष समस्त कुलका संहार कर डालोगे। हलधारी श्रीमान्‌ बलरामजी स्वयं ही अपने शरीरको त्यागकर समुद्रमें चले जायँगे और महात्मा श्रीकृष्ण जब भूतलपर सो रहे होंगे उस समय जरा नामक व्याध उन्हें अपने बाणोंसे बींध डालेगा

जिस कर्म से तुम अत्यन्त दुष्ट, निर्दयी और क्रोध से उन्मत्त हो गए हो—तुम राम और जनार्दन को छोड़कर अपने समस्त कुल के उच्छेदक बनोगे।

Verse 21

समुद्र यास्यति श्रीमांस्त्यक्त्वा देह हलायुध: । जरा कृष्णं महात्मानं शयानं भुवि भेत्स्यति,राजन! जन दुर्बुद्धि बालकोंके वज्चनापूर्ण बर्तावसे वे सभी महर्षि कुपित हो उठे। क्रोधसे उनकी आँखें लाल हो गयीं और वे एक-दूसरेकी ओर देखकर इस प्रकार बोले -- क्रूर, क्रोधी और दुराचारी यादवकुमारो! भगवान्‌ श्रीकृष्णका यह पुत्र साम्ब एक भयंकर लोहेका मूसल उत्पन्न करेगा जो वृष्णि और अन्धकवंशके विनाशका कारण होगा। उसीसे तुम लोग बलराम और श्रीकृष्णके सिवा अपने शेष समस्त कुलका संहार कर डालोगे। हलधारी श्रीमान्‌ बलरामजी स्वयं ही अपने शरीरको त्यागकर समुद्रमें चले जायँगे और महात्मा श्रीकृष्ण जब भूतलपर सो रहे होंगे उस समय जरा नामक व्याध उन्हें अपने बाणोंसे बींध डालेगा

श्रीमान् हलायुध बलराम देह त्यागकर समुद्र को चले जाएँगे; और महात्मा कृष्ण जब पृथ्वी पर शयन कर रहे होंगे, तब जरा नामक व्याध उन्हें बाण से बेध देगा।

Verse 22

इत्यब्रुवन्त ते राजन्‌ प्रलब्धास्तैर्दुरात्मभि: । मुनयः क्रोधरक्ताक्षा: समीक्ष्याथ परस्परम्‌,राजन! जन दुर्बुद्धि बालकोंके वज्चनापूर्ण बर्तावसे वे सभी महर्षि कुपित हो उठे। क्रोधसे उनकी आँखें लाल हो गयीं और वे एक-दूसरेकी ओर देखकर इस प्रकार बोले -- क्रूर, क्रोधी और दुराचारी यादवकुमारो! भगवान्‌ श्रीकृष्णका यह पुत्र साम्ब एक भयंकर लोहेका मूसल उत्पन्न करेगा जो वृष्णि और अन्धकवंशके विनाशका कारण होगा। उसीसे तुम लोग बलराम और श्रीकृष्णके सिवा अपने शेष समस्त कुलका संहार कर डालोगे। हलधारी श्रीमान्‌ बलरामजी स्वयं ही अपने शरीरको त्यागकर समुद्रमें चले जायँगे और महात्मा श्रीकृष्ण जब भूतलपर सो रहे होंगे उस समय जरा नामक व्याध उन्हें अपने बाणोंसे बींध डालेगा

राजन्! उन दुरात्मा युवकों द्वारा उपहासित होकर वे मुनि इस प्रकार बोले। क्रोध से उनकी आँखें लाल हो गईं; फिर वे परस्पर एक-दूसरे को देखकर बोले।

Verse 23

तथोकत्वा मुनयस्ते तु ततः केशवमभ्ययु: । अथाब्रवीत्‌ तदा वृष्णीन्‌ श्र॒त्वैवं मधुसूदन:,ऐसा कहकर वे मुनि भगवान्‌ श्रीकृष्णके पास चले गये। (वहाँ उन्होंने उनसे सारी बातें कह सुनायीं।) यह सब सुनकर भगवान्‌ मधुसूदनने वृष्णिवंशियोंसे कहा--

ऐसा कहकर वे मुनि फिर केशव के पास गए। यह सब सुनकर मधुसूदन ने तब वृष्णियों से कहा।

Verse 24

अन्तज्ञो मतिमांस्तस्य भवितव्यं तथेति तान्‌ | एवमुकत्वा हृषीकेश: प्रविवेश पुरं तदा,“ऋषियोंने जैसा कहा है, वैसा ही होगा।' बुद्धिमान्‌ श्रीकृष्ण सबके अन्तको जाननेवाले हैं। उन्होंने उपर्युक्त बात कहकर नगरमें प्रवेश किया

अन्त को जानने वाले बुद्धिमान् हृषीकेश ने उनसे कहा—“ऋषियों ने जैसा कहा है, वैसा ही होगा।” यह कहकर वे उस समय नगर में प्रविष्ट हुए।

Verse 25

कृतान्तमन्यथा नैच्छत्‌ कर्तु स जगतः प्रभु: । श्वोभूतेडथ ततः साम्बो मुसलं तदसूत वै,यद्यपि भगवान्‌ श्रीकृष्ण सम्पूर्ण जगत्‌के ईश्वर हैं तथापि यदुवंशियोंपर आनेवाले उस कालको उन्होंने पलटनेकी इच्छा नहीं की। दूसरे दिन सबेरा होते ही साम्बने उस मूसलको जन्म दिया

यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण जगत् के प्रभु थे, तथापि यदुवंश पर आने वाले उस कृतान्त को अन्यथा करने की उन्होंने इच्छा न की। दूसरे दिन प्रातःकाल साम्ब ने उस मूसल को उत्पन्न किया।

Verse 26

येन वृष्ण्यन्धककुले पुरुषा भस्मसात्‌ कृता: । वृष्ण्यन्धकविनाशाय किंकरप्रतिमं महत्‌,वह वही मूसल था जिसने वृष्णि और अन्धककुलके समस्त पुरुषोंको भस्मसात्‌ कर दिया। वृष्णि और अन्धक वंशके वीरोंका विनाश करनेके लिये वह महान्‌ यमदूतके ही तुल्य था

वही मूसल था, जिसने वृष्णि और अन्धक कुल के समस्त पुरुषों को भस्मसात् कर दिया। वृष्णि-अन्धक वंश के विनाश के लिये वह महान् वस्तु मानो यम का दूत ही थी।

Verse 27

असूत शापजं घोरं तच्च राज्ञे न्यवेदयन्‌ | विषण्णरूपस्तद्‌ राजा सूक्ष्मं चूर्णमकारयत्‌,जब साम्बने उस शापजनित भयंकर मूसलको पैदा किया तब यदुवंशियोंने उसे ले जाकर राजा उग्रसेनको दे दिया। उसे देखते ही राजाके मनमें विषाद छा गया। उन्होंने उस मूसलको कुटवाकर अत्यन्त महीन चूर्ण करा दिया

साम्ब ने शाप से उत्पन्न उस घोर मूसल को जन्म दिया; तब यदुवीरों ने उसे राजा उग्रसेन को निवेदित किया। उसे देखकर राजा विषण्ण हो उठा और उसने उस मूसल को कुटवाकर अत्यन्त सूक्ष्म चूर्ण करवा दिया।

Verse 28

तच्चूर्ण सागरे चापि प्राक्षिपन्‌ पुरुषा नूप । अघोषयंश्व नगरे वचनादाहुकस्य ते

हे नृप! उन पुरुषों ने उस चूर्ण को समुद्र में भी फेंक दिया और आहुक के वचनानुसार नगर में घोषणा भी कर दी।

Verse 29

जनार्दनस्य रामस्य बश्रोश्नैव महात्मन: । अद्यप्रभृति सर्वेषु वृष्ण्यन्धककुलेष्विह

वैशम्पायन बोले—हे राजन्! आज से यहाँ वृष्णि और अन्धक कुलों के सभी जनों में महात्मा जनार्दन और बलराम के बाहु मानो क्रोध से तप्त हो उठेंगे।

Verse 30

सुरासवो न कर्तव्य: सर्वर्नगरवासिभि: । नरेश्वर! राजाकी आज्ञासे उनके सेवकोंने उस लोहचूर्णको समुद्रमें फेंक दिया। फिर उमग्रसेन, श्रीकृष्ण, बलराम और महामना बश्रुके आदेशसे राजपुरुषोंने नगरमें यह घोषणा करा दी कि “आजसे समस्त वृष्णिवंशी और अन्धकवंशी क्षत्रियोंके यहाँ कोई भी नगरनिवासी मदिरा न तैयार करें || २८-२९३$ ।। यश्न नो<विदितं कुर्यात्‌ पेयं कश्चिन्नरः क्वचित्‌

वैशम्पायन बोले—हे नरेश्वर! नगर के किसी भी निवासी को सुरा-आसव (मद्य) तैयार नहीं करना चाहिए। समस्त नगरवासियों के लिए मद्य-निर्माण निषिद्ध हो।

Verse 31

ततो राजभयात्‌ सर्वे नियमं चक्रिरे तदा । नरा: शासनमाज्ञाय रामस्याक्लिष्टकर्मण:

तब राजा के भय से उन सबने उसी समय कठोर नियम धारण किया। उन पुरुषों ने अक्लिष्टकर्मा बलराम की आज्ञा समझकर उसके शासन को शिरसा स्वीकार किया।

Verse 306

जीवन्‌ स शूलमारोहेत्‌ स्वयं कृत्वा सबान्धव: । 'जो मनुष्य कहीं भी हमलोगोंसे छिपकर कोई नशीली पीनेकी वस्तु तैयार करेगा वह स्वयं वह अपराध करके जीतेजी अपने भाई-बन्धुओंसहित शूलीपर चढ़ा दिया जायगा'

वैशम्पायन बोले—जो मनुष्य कहीं भी हमसे छिपकर कोई नशीली पेय-वस्तु तैयार करेगा, वह अपने ही किए अपराध के कारण अपने बन्धु-बान्धवों सहित जीते-जी शूली पर चढ़ाया जाएगा।

Frequently Asked Questions

The dilemma is how a responsible ruler should respond when signs and reports indicate catastrophic, seemingly fated events: whether to treat them as actionable intelligence for policy, or as symptoms of an inevitable karmic turning that limits effective intervention.

The implied upadeśa is that even the most stable political orders are contingent; vigilance and deliberation remain duties, yet outcomes may still reflect broader temporal and karmic processes beyond individual mastery.

No explicit phalāśruti is presented here; the chapter functions as a diagnostic prologue, using omen catalogues and the shock of news to frame the epic’s concluding movement toward withdrawal and renunciation.