वैशम्पायन उवाच श्रुत्वैतदप्रियं राजा धृतराष्ट्रोडम्बिकासुत: । पपात भूमौ निश्वेष्टश्छिन्नममूल इव द्रुम:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यह अप्रिय समाचार सुनकर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र निश्वेष्ट हो जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े
vaiśampāyana uvāca: śrutvaitad apriyaṃ rājā dhṛtarāṣṭro ’mbikāsutaḥ | papāta bhūmau niṣveṣṭaś chinnamūla iva drumaḥ ||
वैशम्पायन बोले—जनमेजय! यह अप्रिय समाचार सुनते ही अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र जड़ से कटे वृक्ष की भाँति तड़पते हुए पृथ्वी पर गिर पड़े।
वैशम्पायन उवाच